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Gayatri Devi: मां गायत्री को क्यों कहते हैं वेदमाता? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Gayatri Devi: धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मां गायत्री को पंचमुखी देवी के रूप में वर्णित किया गया है। उनके पांच मुख पांच वेदांगों और ज्ञान के विभिन्न स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

वेदमाता
Gayatri Devi: सनातन धर्म में मां गायत्री को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें वेदमाता, देवमाता और विश्वमाता के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि समस्त वेदों का उद्गम मां गायत्री से हुआ है, यही कारण है कि उन्हें “वेदमाता” कहा जाता है। गायत्री मंत्र को वेदों का सार माना गया है और यह मंत्र स्वयं मां गायत्री का स्वरूप माना जाता है। पौराणिक कथाओं में मां गायत्री के वेदमाता कहलाने के पीछे एक विशेष रहस्य और प्रसंग का उल्लेख मिलता है, जो ब्रह्माजी, यज्ञ और वेदों की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है।

मां गायत्री का दिव्य स्वरूप

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मां गायत्री को पंचमुखी देवी के रूप में वर्णित किया गया है। उनके पांच मुख पांच वेदांगों और ज्ञान के विभिन्न स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके हाथों में कमंडल, पुस्तक, जपमाला और अन्य दिव्य आयुध सुशोभित रहते हैं। उनका तेज हजारों सूर्यों के समान बताया गया है। गायत्री देवी को ज्ञान, तप, साधना और वैदिक शक्ति की अधिष्ठात्री माना जाता है। वे केवल एक देवी नहीं बल्कि वेदों की चेतना का साक्षात स्वरूप मानी जाती हैं। इसी कारण वैदिक परंपरा में उनका विशेष महत्व है।

कैसे प्रकट हुईं मां गायत्री

पुराणों में वर्णन मिलता है कि सृष्टि की रचना के समय ब्रह्माजी ने देवताओं और ऋषियों के कल्याण के लिए एक महान यज्ञ करने का संकल्प लिया। यज्ञ की पूर्णता के लिए उनकी पत्नी सावित्री का उपस्थित होना आवश्यक था। निर्धारित समय पर जब यज्ञ प्रारंभ होने का समय आया तो सावित्री वहां नहीं पहुंचीं।

यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकलता जा रहा था। देवताओं और ऋषियों ने ब्रह्माजी से आग्रह किया कि यज्ञ को समय पर आरंभ करना आवश्यक है। ऐसे में इंद्रदेव को एक योग्य कन्या की खोज करने का आदेश दिया गया। कथा के अनुसार इंद्रदेव पृथ्वी पर आए और उन्हें एक अत्यंत तेजस्विनी, पवित्र तथा दिव्य गुणों से युक्त कन्या मिली। उस कन्या को यज्ञ के लिए लाया गया।

वैदिक विधि से उसका शुद्धिकरण किया गया और उसे दिव्य स्वरूप प्रदान किया गया। यही कन्या आगे चलकर गायत्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। इसके बाद ब्रह्माजी ने गायत्री के साथ यज्ञ में आहुति दी और यज्ञ पूर्ण किया। यज्ञ की पूर्णता के साथ ही दिव्य ज्ञान की धाराएं प्रकट हुईं, जिनसे वेदों का प्रकाश संसार में फैला।

वेदों की उत्पत्ति और गायत्री देवी

अनेक धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि वेद ब्रह्माजी के मुख से प्रकट हुए थे। किंतु उन वेदों को शक्ति और चेतना प्रदान करने वाली देवी गायत्री ही थीं। वेदों का ज्ञान, उनका सार और उनकी दिव्य ऊर्जा मां गायत्री से ही उत्पन्न मानी गई। कथा में कहा गया है कि जब ब्रह्माजी ने सृष्टि निर्माण का कार्य प्रारंभ किया तब उन्हें उस ज्ञान की आवश्यकता हुई जिससे सृष्टि का संचालन हो सके।

उस समय मां गायत्री ने उन्हें वैदिक ज्ञान प्रदान किया। उसी ज्ञान से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का विस्तार हुआ। इसी कारण धार्मिक परंपराओं में कहा गया कि वेदों की जननी गायत्री हैं। वेद उनके ज्ञान का विस्तार हैं और वैदिक ऋचाएं उनकी वाणी का स्वरूप हैं। इस मान्यता के आधार पर उन्हें “वेदमाता” की उपाधि प्राप्त हुई।

गायत्री मंत्र और वेदमाता का संबंध

मां गायत्री को वेदमाता कहे जाने का सबसे प्रमुख कारण गायत्री मंत्र भी माना जाता है। यह मंत्र ऋग्वेद में वर्णित है और इसे समस्त वेदों का सार कहा गया है।

“ॐ भूर् भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥”


धार्मिक मान्यता के अनुसार इस मंत्र में समस्त वैदिक ज्ञान समाहित है। ऋषि विश्वामित्र को इस मंत्र का दृष्टा माना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने कठोर तपस्या के बाद इस दिव्य मंत्र का साक्षात्कार किया। गायत्री मंत्र को वेदों का सार माना गया और यह मंत्र स्वयं देवी गायत्री का स्वरूप माना गया, इसलिए भी उन्हें वेदमाता कहा गया। वैदिक ऋषियों ने गायत्री को उस मूल शक्ति के रूप में स्वीकार किया जिससे समस्त वैदिक ज्ञान प्रवाहित होता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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