विज्ञापन
Home  mythology  brahmaputra nadi har sal 3 din ke liye ambubachi mela ke dauran laal kyon ho jati hai maa kamakhya story

Brahmaputra Nadi: अंबुबाची मेले के दौरान लाल क्यों हो जाती है ब्रह्मपुत्र नदी? मां कामाख्या से जुड़ा है रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Brahmaputra Nadi: अंबुबाची मेला देवी शक्ति की उपासना का एक विशेष पर्व माना जाता है। तांत्रिक परंपरा में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मान्यता है कि वर्ष में एक बार मां कामाख्या तीन दिनों के लिए रजस्वला होती हैं। 

Brahmaputra Nadi:
Brahmaputra Nadi: अंबुबाची मेला भारत के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक, कामाख्या मंदिर से जुड़ा एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है। हर वर्ष आषाढ़ मास में आयोजित होने वाले इस मेले के दौरान एक ऐसी मान्यता चर्चा का विषय बनती है, जिसके अनुसार इन दिनों ब्रह्मपुत्र नदी का जल लाल रंग का दिखाई देता है। श्रद्धालु इसे मां कामाख्या के वार्षिक रजस्वला काल से जोड़कर देखते हैं। अंबुबाची मेले का पूरा आधार ही देवी के इसी दिव्य स्वरूप और उससे जुड़ी पौराणिक मान्यताओं पर टिका हुआ है। यही कारण है कि इस अवधि में लाखों श्रद्धालु और साधक असम पहुंचते हैं और मां कामाख्या के दर्शन का इंतजार करते हैं।

क्या है अंबुबाची मेले का धार्मिक महत्व

अंबुबाची मेला देवी शक्ति की उपासना का एक विशेष पर्व माना जाता है। तांत्रिक परंपरा में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मान्यता है कि वर्ष में एक बार मां कामाख्या तीन दिनों के लिए रजस्वला होती हैं। इस दौरान मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और नियमित पूजा-अर्चना भी रोक दी जाती है। इन तीन दिनों तक देवी को विश्राम दिया जाता है। चौथे दिन विशेष पूजा और अनुष्ठानों के बाद मंदिर के कपाट दोबारा खोले जाते हैं। इसी अवसर को अंबुबाची महापर्व के रूप में मनाया जाता है। देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु इस दिन मां के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं।

 

Kamakhya Mandir Ambubachi Mela

मां कामाख्या शक्तिपीठ की पौराणिक कथा

अंबुबाची मेले की मान्यता का संबंध सीधे मां कामाख्या शक्तिपीठ से जुड़ा हुआ है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। उन्होंने अपने दामाद भगवान शिव को उस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया। जब माता सती को यह ज्ञात हुआ तो वे बिना निमंत्रण के ही यज्ञ में पहुंच गईं।

यज्ञ स्थल पर राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया। अपने पति का अपमान सहन न कर पाने के कारण माता सती ने यज्ञ की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। जब भगवान शिव को इस घटना का पता चला तो वे अत्यंत क्रोधित और शोकाकुल हो गए। उन्होंने माता सती के पार्थिव शरीर को उठाया और तांडव करने लगे।

भगवान शिव के तांडव से समस्त सृष्टि संकट में पड़ गई, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अनेक खंड कर दिए। जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मान्यता है कि असम के नीलाचल पर्वत पर माता सती का योनिभाग गिरा था। यही स्थान आगे चलकर कामाख्या शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। चूंकि यहां देवी के मातृत्व और सृजन शक्ति के प्रतीक स्वरूप की पूजा होती है, इसलिए यह मंदिर अन्य शक्तिपीठों से अलग माना जाता है।

क्यों मनाया जाता है मां कामाख्या का रजस्वला पर्व

कामाख्या मंदिर में देवी की कोई पारंपरिक प्रतिमा नहीं है। यहां एक प्राकृतिक शिलाखंड की पूजा की जाती है, जिसे देवी का स्वरूप माना जाता है। इस शिलाखंड से एक प्राकृतिक जलधारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार आषाढ़ मास में मां कामाख्या रजस्वला होती हैं। इसी कारण मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। इन दिनों किसी भी श्रद्धालु को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं होती। देवी के इस स्वरूप को सृष्टि की जननी और सृजन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। अंबुबाची पर्व इसी दिव्य घटना की स्मृति में मनाया जाता है। तांत्रिक ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं में इसका विशेष उल्लेख मिलता है।

 

ब्रह्मपुत्र नदी

ब्रह्मपुत्र नदी के लाल होने की मान्यता

अंबुबाची मेले के दौरान सबसे अधिक चर्चा जिस विषय की होती है, वह है ब्रह्मपुत्र नदी के जल का लाल दिखाई देना। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब मां कामाख्या रजस्वला होती हैं, तब उनकी शक्ति का प्रभाव आसपास के पूरे क्षेत्र पर पड़ता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि देवी के रजस्वला काल के कारण ब्रह्मपुत्र नदी का जल लालिमा लिए हुए दिखाई देता है। इस लाल रंग को देवी की दिव्य शक्ति और उनके रजस्वला स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि अंबुबाची मेले के समय ब्रह्मपुत्र नदी को विशेष श्रद्धा के साथ देखा जाता है। अनेक श्रद्धालु इस अवधि में नदी के तट पर पहुंचकर पूजा-पाठ और साधना भी करते हैं।

लाल वस्त्र और अंगोदक की परंपरा

अंबुबाची मेले से जुड़ी एक विशेष परंपरा लाल वस्त्र की भी है। मान्यता है कि जब मंदिर तीन दिनों के लिए बंद रहता है, तब गर्भगृह में सफेद वस्त्र अर्पित किया जाता है। कपाट खुलने के बाद वही वस्त्र लाल रंग का दिखाई देता है। इस वस्त्र को अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसे "अंगवस्त्र" या "रक्त वस्त्र" कहा जाता है। श्रद्धालुओं को प्रसाद स्वरूप इसके छोटे-छोटे टुकड़े दिए जाते हैं। इसी प्रकार गर्भगृह से प्राप्त जल को "अंगोदक" कहा जाता है। भक्त इसे देवी का विशेष आशीर्वाद मानकर ग्रहण करते हैं। अंबुबाची मेले में अंगोदक और अंगवस्त्र प्राप्त करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

तांत्रिक साधना का सबसे बड़ा पर्व

अंबुबाची मेला केवल सामान्य श्रद्धालुओं का ही नहीं, बल्कि तांत्रिक साधकों का भी प्रमुख पर्व माना जाता है। मान्यता है कि इन दिनों देवी शक्ति विशेष रूप से जागृत रहती हैं और साधना का फल शीघ्र प्राप्त होता है। देश के विभिन्न भागों से तांत्रिक, अघोरी, संन्यासी और साधु कामाख्या पहुंचते हैं। मंदिर परिसर और नीलाचल पर्वत के आसपास अनेक विशेष अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। तांत्रिक परंपरा में कामाख्या को शक्ति साधना का सर्वोच्च केंद्र माना गया है, इसलिए अंबुबाची मेले का महत्व साधकों के लिए और भी अधिक बढ़ जाता है।


यह भी पढ़ें:- 

Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व 

Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 

Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
 
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel