एताम्-ऐसे; दृष्टिम् विचार; अवष्टभ्य-देखते हैं; नष्ट-दिशाहीन होकर; आत्मानः-जीवात्माएँ आप; अल्प-बुद्धयः-अल्पज्ञान; प्रभवन्ति-जन्मते हैं; उग्र-निर्दयी; कर्माणः-कर्म; क्षयाय–विनाशकारी; जगतः-संसार का; अहिताः-शत्रु।
अर्थ - नास्तिक दृष्टि का आश्रय लेने वाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूप को नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसार के शत्रु हैं, उन मनुष्यों की सामर्थ्य का उपयोग जगत् का नाश करने के लिये ही होता है।
व्याख्या - अब इस श्लोक में श्री कृष्ण समझाते है कि कैसे आसुरी बुद्धि वाले लोग इस संसार के विनाश का कारण बनते है। यदि कामवासना को ही मूल कारण समझकर समाज में पाशविक प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित किया जाये तो उसका परिणाम सर्वत्र अशान्ति और कलह विध्वंस और विनाश ही होगा। 'एतां दृष्टिमवष्टभ्य' पद से कृष्ण कहते है न पाप पुण्य है, न परलोक है, न किये हुए कर्मों का कोई दण्ड विधान है। ऐसी नास्तिक दृष्टि का आश्रय लेकर वे चलते हैं।
'नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः' यानी कि आत्मा कोई चेतन तत्त्व है, आत्मा की कोई सत्ता है। इस बात को वे मानते ही नहीं। उनकी दृष्टि में जड ही मुख्य होता है। इसलिये वे चेतन तत्त्व से बिलकुल ही विमुख रहते हैं। चेतनतत्त्व (आत्मा) से विमुख होने से उनका पतन हो चुका होता है। सत्य तत्त्व क्या है? धर्म क्या है? अधर्म क्या है? सदाचार दुराचार क्या है और उनका परिणाम क्या होता है ! इस विषयमें उनकी बुद्धि काम नहीं करती।
परन्तु धनादि वस्तुओं के संग्रह में उनकी बुद्धि बड़ी तेज होती है। तात्पर्य यह है कि पारमार्थिक उन्नति के विषय में उनकी बुद्धि तुच्छ होती है और सांसारिक भोगों में फँसने के लिये उनकी बुद्धि बड़ी तेज होती है।
'उग्रकर्माणः' यानी कि वे किसी से डरते ही नहीं। यदि डरेंगे तो चोर , डाकू या राजकीय आदमी से डरेंगे। ईश्वर से, परलोक से, मर्यादा से वे नहीं डरते। ईश्वर और परलोक का भय न होने से उनके द्वारा दूसरों की हत्या आदि बड़े भयानक कर्म होते हैं। उनका स्वभाव खराब होने से वे दूसरों का अहित (नुकसान) करने में ही लगे रहते हैं और दूसरों का नुकसान करने में ही उनको सुख होता है।
'जगतः क्षयाय प्रभवन्ति' यानी कि दूसरों का नाश ही उनका उद्देश्य होता है। अपना स्वार्थ पूरा सिद्ध हो या थोड़ा सिद्ध हो अथवा बिलकुल सिद्ध न हो पर वे दूसरों की उन्नति को सह नहीं सकते। दूसरों का नाश करने में ही उनको सुख होता है अर्थात् पराया हक छीनना, किसी को जान से मार देना। इसी में उनको प्रसन्नता होती है।