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Sawan Shivratri: सावन शिवरात्रि पर करें इस व्रत कथा का पाठ, भगवान शिव की कृपा से दूर होंगे कष्ट

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Sawan Shivratri: कथा के अनुसार रात के पहले पहर में एक हिरणी वहां पानी पीने के लिए पहुंची। शिकारी ने उसे देखा और तुरंत अपना धनुष-बाण संभाल लिया। जैसे ही वह हिरणी का शिकार करने वाला था, हिरणी ने उससे अपने प्राणों की रक्षा के लिए विनती की।

Sawan Shivratri
Sawan Shivratri: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस पूरे महीने शिव भक्त सोमवार के व्रत रखते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और भगवान भोलेनाथ को बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल तथा जल अर्पित करते हैं। वहीं सावन मास की शिवरात्रि का अपना अलग धार्मिक महत्व बताया गया है। इस दिन भगवान शिव की पूजा के साथ व्रत कथा का पाठ करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि सावन शिवरात्रि के दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान शिव का पूजन करने के बाद शिवरात्रि व्रत कथा का श्रवण या पाठ करने से भोलेनाथ की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के कष्ट दूर होने की कामना की जाती है। शिवरात्रि व्रत से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा में एक शिकारी का वर्णन मिलता है। सावन शिवरात्रि के अवसर पर इस कथा का पाठ करना शुभ माना जाता है।

सावन शिवरात्रि पर पढ़ें शिकारी की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक शिकारी रहता था। वह जंगल में शिकार करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। एक दिन वह जंगल में शिकार करने के लिए गया, लेकिन काफी समय तक उसे कोई शिकार नहीं मिला। दिन ढलने लगा और रात हो गई। अंधेरा बढ़ने के कारण शिकारी के लिए जंगल से बाहर निकलना कठिन हो गया।

जंगली जानवरों से अपनी रक्षा करने के लिए वह एक पेड़ पर चढ़ गया। उस रात उसे भूखा-प्यासा ही पेड़ पर बैठकर रात बितानी पड़ी। शिकारी को डर था कि यदि वह नीचे उतरा तो कोई जंगली जानवर उस पर हमला कर सकता है। इसलिए उसने पूरी रात पेड़ पर ही रहने का निर्णय लिया।

शिकारी जिस पेड़ पर बैठा था, उसके नीचे एक शिवलिंग स्थापित था। हालांकि शिकारी को उस समय इस बात का पता नहीं था। रात बीतने लगी और वह लगातार बेचैन होकर इधर-उधर देखता रहा। उसे उम्मीद थी कि कोई हिरण या अन्य जंगली जानवर वहां आएगा और वह उसका शिकार कर सकेगा।

 

Sawan Shivratri

पहले पहर में हुआ शिवलिंग का अभिषेक

कथा के अनुसार रात के पहले पहर में एक हिरणी वहां पानी पीने के लिए पहुंची। शिकारी ने उसे देखा और तुरंत अपना धनुष-बाण संभाल लिया। जैसे ही वह हिरणी का शिकार करने वाला था, हिरणी ने उससे अपने प्राणों की रक्षा के लिए विनती की।

हिरणी ने कहा कि उसके छोटे-छोटे बच्चे उसका इंतजार कर रहे हैं। वह अपने बच्चों को सुरक्षित स्थान पर छोड़कर वापस लौट आएगी। हिरणी की बात सुनकर शिकारी ने उसे जाने दिया। कथा में बताया गया है कि जब शिकारी ने धनुष उठाया और पेड़ की एक टहनी को हिलाया, तो उस पर मौजूद ओस की बूंदें नीचे रखे शिवलिंग पर गिर गईं। इस प्रकार अनजाने में ही भगवान शिव का जलाभिषेक हो गया।

दूसरे पहर में फिर पहुंची हिरणी

कुछ समय बाद रात का दूसरा पहर आया। एक दूसरी हिरणी वहां पहुंची। शिकारी ने उसे भी देख लिया और उसका शिकार करने के लिए धनुष पर बाण चढ़ाया। हिरणी ने शिकारी से कुछ समय मांगा और कहा कि वह अपने परिवार से मिलकर वापस लौट आएगी। शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस दौरान जब उसने धनुष उठाया तो पेड़ की पत्तियां और ओस की बूंदें फिर शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दूसरी बार भी अनजाने में भगवान शिव का पूजन और अभिषेक हो गया।

शिकारी का मन धीरे-धीरे बदलने लगा

रात गहराती जा रही थी। शिकारी भूखा-प्यासा पेड़ पर बैठा था। उसके सामने बार-बार हिरणियां आ रही थीं और वह उन्हें जाने दे रहा था। इसी तरह रात के पहर बीतते गए। कथा के अनुसार उस रात शिकारी ने भोजन नहीं किया और न ही जल ग्रहण किया। वह पूरी रात जागता रहा। तीसरे पहर में एक हिरण वहां आया। शिकारी ने उसे भी पकड़ने की कोशिश की। हिरण ने कहा कि वह अपनी पत्नी और बच्चों से मिलकर वापस आएगा। शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस दौरान फिर से पेड़ की पत्तियां और जल की बूंदें शिवलिंग पर गिरीं। इस तरह शिवलिंग पर बेलपत्र और जल अर्पित होने की धार्मिक मान्यता कथा में बताई गई है।

 

LORD SHIV

चौथे पहर में पूरा हुआ शिव पूजन

रात का अंतिम पहर आया तो सभी हिरण अपने परिवार के साथ शिकारी के सामने वापस लौट आए। उन्होंने शिकारी से कहा कि वे अपना वचन पूरा करने के लिए वापस आए हैं। शिकारी उनके सत्य और अपने वचन के प्रति दृढ़ रहने से प्रभावित हुआ। अब शिकारी ने अपना धनुष-बाण नीचे रख दिया। उसने हिरणों का शिकार करने का विचार छोड़ दिया। कथा के अनुसार पूरी रात जागरण, उपवास और शिवलिंग पर जल तथा बेलपत्र अर्पित होने से उसका अनजाने में ही शिवरात्रि व्रत पूरा हो चुका था।

भगवान शिव ने दिया शिकारी को आशीर्वाद

कथा के अनुसार शिकारी के इस प्रकार व्रत पूरा करने और शिवलिंग की पूजा होने से भगवान शिव प्रसन्न हुए। भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए और उसे आशीर्वाद दिया। शिव कृपा से उसके जीवन के पाप और कष्ट दूर हुए तथा उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। इसी कथा के आधार पर शिवरात्रि के दिन उपवास, रात्रि जागरण और चारों पहर भगवान शिव के पूजन की परंपरा को विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि शिवरात्रि की रात शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करके भगवान शिव की आराधना करने से भक्त को पुण्य की प्राप्ति होती है।

सावन शिवरात्रि पर कथा पाठ की परंपरा

सावन शिवरात्रि के दिन भक्त सुबह स्नान करके भगवान शिव का ध्यान करते हैं और व्रत का संकल्प लेते हैं। इसके बाद शिवलिंग का जलाभिषेक और पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, आक के पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के बाद शिवरात्रि व्रत कथा का पाठ किया जाता है। रात्रि में चारों पहर भगवान शिव की पूजा करने की भी परंपरा है। प्रत्येक पहर शिवलिंग पर जल अर्पित कर भगवान शिव के मंत्रों का जाप और कथा का पाठ किया जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार पूरी रात भगवान शिव का स्मरण करते हैं।

शिवरात्रि की रात भगवान शिव की पूजा में कथा का पाठ विशेष रूप से किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धा से कथा सुनने और भगवान शिव का नाम लेने से भक्त को शिव कृपा प्राप्त होती है। सावन शिवरात्रि के दिन इस कथा का पाठ करने से भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों पर प्रसन्न होते हैं और उनके जीवन से संकट दूर होने की कामना की जाती है।

 

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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