Mangala Gauri Vrat: पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक नगर में धर्मपाल नाम का एक धनी व्यापारी रहता था। उसके पास धन, संपत्ति और किसी प्रकार के सुख-सुविधा की कमी नहीं थी।
Mangala Gauri Vrat: सावन मास में भगवान शिव के साथ माता पार्वती की उपासना का भी विशेष विधान माना गया है। सावन के प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। वर्ष 2026 में सावन का दूसरा मंगला गौरी व्रत 11 अगस्त, मंगलवार को पड़ रहा है। इस दिन सुहागिन महिलाएं माता गौरी की पूजा-अर्चना कर व्रत रखती हैं और उनके अखंड सौभाग्य तथा पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। धार्मिक परंपरा में इस व्रत के दौरान मंगला गौरी व्रत कथा का पाठ और श्रवण भी किया जाता है।
मंगला गौरी व्रत से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा सेठ धर्मपाल और उनके पुत्र की है। इस कथा में माता पार्वती की कृपा और मंगला गौरी व्रत के पुण्य प्रभाव से एक अल्पायु युवक के जीवन पर आया संकट टल जाता है। मान्यता है कि दूसरे मंगला गौरी व्रत के दिन श्रद्धा से इस कथा का पाठ करने से माता गौरी और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।
व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक नगर में धर्मपाल नाम का एक धनी व्यापारी रहता था। उसके पास धन, संपत्ति और किसी प्रकार के सुख-सुविधा की कमी नहीं थी। उसकी पत्नी भी अत्यंत धार्मिक और पतिव्रता थी। दोनों पति-पत्नी भगवान शिव और माता पार्वती के भक्त थे, लेकिन उनके जीवन में एक बड़ा दुख था। उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी।
संतान प्राप्ति की इच्छा से दोनों ने भगवान शिव की आराधना की। लंबे समय तक पूजा-पाठ और प्रार्थना करने के बाद भगवान शिव की कृपा से उनके घर पुत्र का जन्म हुआ। पुत्र के जन्म से धर्मपाल और उसकी पत्नी का जीवन खुशियों से भर गया। लेकिन जन्म के समय ही उसके अल्पायु होने की बात सामने आई थी। ज्योतिषियों के अनुसार, बालक की आयु केवल 16 वर्ष की थी और 16 वर्ष की आयु में सर्पदंश से उसकी मृत्यु होने का योग बताया गया था।
धर्मपाल को पुत्र की आयु को लेकर चिंता रहने लगी
पुत्र के जन्म से धर्मपाल के घर में खुशी तो आई, लेकिन उसके मन में हमेशा एक भय बना रहता था। उसे यह चिंता सताती रहती थी कि जिस पुत्र को बड़ी मन्नतों के बाद प्राप्त किया है, वह अल्पायु है। समय बीतता गया और बालक धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। धर्मपाल ने अपने पुत्र की आयु के संबंध में मिली भविष्यवाणी को ध्यान में रखते हुए उसका विवाह कम उम्र में ही करने का निश्चय किया। संयोग से उसके पुत्र का विवाह ऐसी कन्या से हुआ, जिसकी माता मंगला गौरी व्रत का विधिपूर्वक पालन करती थी। धार्मिक मान्यता थी कि मंगला गौरी व्रत के पुण्य से उस कन्या को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त था। विवाह के बाद भी कन्या ने मंगला गौरी व्रत करना नहीं छोड़ा। वह सावन मास के प्रत्येक मंगलवार को माता गौरी की पूजा करती और पूरे विधि-विधान के साथ व्रत रखती थी।
माता गौरी ने कन्या को स्वप्न में दिया संकेत
कथा के अनुसार, विवाह के कुछ समय बाद माता गौरी कन्या की भक्ति से प्रसन्न हुईं। एक रात माता पार्वती ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए। माता ने उसे बताया कि उसके पति की आयु अल्प है और उसके जीवन पर सर्पदंश का संकट आने वाला है। माता गौरी ने कन्या को उस संकट से बचने का उपाय भी बताया। माता के निर्देश के अनुसार उसे दूध से भरा पात्र रखना था और उसके पास एक दूसरा पात्र रखना था। जब सर्प वहां आए तो वह दूध पीकर दूसरे पात्र में चला जाएगा। इसके बाद उस पात्र को ढक देना था।
कन्या ने माता गौरी के आदेश का पालन किया
माता के स्वप्न में दिए निर्देश को कन्या ने पूरी श्रद्धा के साथ स्वीकार किया। उसने अगले मंगलवार को बताए गए अनुसार दूध का पात्र तैयार किया और उसके पास दूसरा पात्र रख दिया। कुछ समय बाद वहां एक विषैला सर्प आया। उसने पात्र में रखा दूध पिया और इसके बाद दूसरे पात्र में प्रवेश कर गया। कन्या ने तुरंत उस पात्र को कपड़े से ढक दिया। इस प्रकार माता गौरी की कृपा से उसके पति के जीवन पर आया सर्पदंश का संकट टल गया।
मंगला गौरी व्रत के पुण्य से टला मृत्यु का संकट
जब कन्या ने अपने परिवार को पूरी घटना बताई तो सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। धर्मपाल और उसकी पत्नी को भी माता गौरी की कृपा का अनुभव हुआ। जिस पुत्र के अल्पायु होने की बात कही गई थी, उसके जीवन पर आया संकट माता पार्वती की कृपा से टल गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मंगला गौरी व्रत के प्रभाव से कन्या को अखंड सौभाग्य प्राप्त हुआ और उसके पति की रक्षा हुई। इसके बाद धर्मपाल के परिवार में सुख और प्रसन्नता लौट आई। माता गौरी की कृपा से दंपती ने दीर्घायु जीवन प्राप्त किया।
मंगला गौरी व्रत कथा का पाठ करने की परंपरा
मंगला गौरी व्रत में माता पार्वती के गौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। सावन के मंगलवार को व्रत रखने वाली महिलाएं माता गौरी की पूजा के बाद व्रत कथा का पाठ या श्रवण करती हैं। कथा के दौरान माता पार्वती और भगवान शिव का स्मरण किया जाता है। दूसरे मंगला गौरी व्रत के दिन भी व्रती महिलाएं स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर माता गौरी की पूजा कर सकती हैं। पूजा के बाद श्रद्धापूर्वक मंगला गौरी व्रत कथा का पाठ किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कथा का पाठ माता गौरी की आराधना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।
माता गौरी और भगवान शिव की पूजा का विधान
मंगला गौरी व्रत के दिन माता पार्वती के साथ भगवान शिव की पूजा भी की जाती है। पूजा में माता गौरी को सुहाग की सामग्री, लाल या पीले पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा है। भगवान शिव का जलाभिषेक कर उन्हें बेलपत्र और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद माता गौरी की पूजा कर मंगला गौरी व्रत कथा का पाठ किया जाता है। कथा पूरी होने के बाद माता पार्वती और भगवान शिव की आरती की जाती है। व्रती महिलाएं माता से अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की प्रार्थना करती हैं।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)