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Mahesh Navami: महेश नवमी पर करें इस व्रत कथा का पाठ, भगवान शिव की कृपा से दूर होंगे सारे कष्ट

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahesh Navami: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में खंडेला नगरी में खड़गलसेन नामक एक प्रतापी और धर्मपरायण राजा राज्य करते थे। उनकी रानी चांपावती भी अत्यंत धार्मिक और सदाचारी थीं।

mahesh navami
Mahesh Navami: महेश नवमी हिंदू धर्म में माहेश्वरी समाज का प्रमुख पर्व माना जाता है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाने वाली महेश नवमी का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। इस दिन भगवान महेश अर्थात शिवजी की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है तथा व्रत रखकर उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन महेश नवमी व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों के जीवन से अनेक प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं। महेश नवमी के अवसर पर पूजा, व्रत और कथा श्रवण को विशेष फलदायी माना गया है। आइए जानते हैं महेश नवमी की विस्तृत व्रत कथा...

महेश नवमी व्रत कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में खंडेला नगरी में खड़गलसेन नामक एक प्रतापी और धर्मपरायण राजा राज्य करते थे। उनकी रानी चांपावती भी अत्यंत धार्मिक और सदाचारी थीं। राज्य में सुख-समृद्धि थी, प्रजा प्रसन्न थी और चारों ओर वैभव का वातावरण था, लेकिन राजा और रानी के जीवन में एक बड़ी कमी थी। उनके कोई संतान नहीं थी। 

संतान प्राप्ति की इच्छा से राजा और रानी ने अनेक यज्ञ, तप और धार्मिक अनुष्ठान किए। अंततः उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। कुछ समय बाद रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम सुजानकुमार रखा गया। राजकुमार अत्यंत बुद्धिमान, पराक्रमी और गुणवान था। समय के साथ वह युवावस्था को प्राप्त हुआ।

एक दिन राजकुमार अपने साथियों के साथ वन में भ्रमण करने गया। वहां उसने एक अत्यंत सुंदर हिरण को देखा। उस हिरण का रूप इतना आकर्षक था कि राजकुमार उसे पकड़ने की इच्छा करने लगा। वह अपने घोड़े पर सवार होकर हिरण के पीछे दौड़ पड़ा। हिरण लगातार वन के भीतर भागता रहा और राजकुमार भी उसका पीछा करता रहा।

कुछ समय बाद वह हिरण एक आश्रम के समीप पहुंचा। यह आश्रम महान ऋषियों का तपोवन था, जहां अनेक मुनि और साधु तपस्या में लीन रहते थे। हिरण आश्रम की शरण में पहुंच गया। राजकुमार भी वहां आ गया और उसने हिरण पर बाण चलाने का प्रयास किया, तभी आश्रम में उपस्थित ऋषियों ने उसे रोकते हुए कहा कि यह स्थान तप और साधना का है। यहां किसी जीव की हिंसा नहीं की जा सकती।

ऋषियों ने राजकुमार को समझाया कि आश्रम में शरण लेने वाले प्राणी की रक्षा करना उनका धर्म है। राजकुमार ने ऋषियों की बात स्वीकार कर ली और हिरण को छोड़ दिया। किंतु इसी समय एक अन्य घटना घटित हुई जिसने आगे चलकर पूरे वंश के भाग्य को बदल दिया।

ऋषियों का क्रोध और श्राप

कथा के अनुसार उसी वन क्षेत्र में कुछ राजकुमार और सैनिक शिकार के उद्देश्य से आए थे। उन्होंने अनेक पशुओं का वध किया और वन की शांति भंग कर दी। जब ऋषियों को यह ज्ञात हुआ तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उन्हें लगा कि राजपरिवार के कारण ही वन में हिंसा बढ़ रही है।

क्रोधित ऋषियों ने पूरे क्षत्रिय वंश को श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से राजपरिवार और उससे जुड़े अनेक लोग संकट में पड़ गए। राज्य में अशांति फैलने लगी और अनेक प्रकार की परेशानियां उत्पन्न होने लगीं। जब राजा खड़गलसेन को इस घटना की जानकारी मिली तो वे अत्यंत चिंतित हुए। उन्होंने ऋषियों से क्षमा मांगने का प्रयास किया, लेकिन ऋषियों का क्रोध शांत नहीं हुआ। तब राजा और उनका परिवार भगवान शिव की शरण में पहुंचे।

भगवान शिव की कठोर आराधना

राजा, रानी और समस्त राजपरिवार ने भगवान शिव की आराधना आरंभ की। उन्होंने उपवास रखे, शिव मंत्रों का जप किया और शिवलिंग का अभिषेक कर महादेव से क्षमा याचना की। कई दिनों तक चलने वाली इस कठिन तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए। भगवान शिव ने अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट होकर राजा और उनके वंशजों को दर्शन दिए।

महादेव ने उनसे कहा कि वे हिंसा और युद्ध का मार्ग छोड़कर धर्म, व्यापार और लोककल्याण का मार्ग अपनाएं। भगवान शिव की आज्ञा को सभी ने श्रद्धापूर्वक स्वीकार कर लिया। महादेव ने अपने त्रिशूल से उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया और कहा कि आज से उनका वंश उनकी विशेष कृपा का अधिकारी होगा। भगवान शिव ने उन्हें नया जीवन और नई पहचान प्रदान की।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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