पंचांग के अनुसार वैशाख पूर्णिमा 11 मई 2025 को रात 08:01 बजे से शुरू होकर 12 मई 2025 को रात 10:25 बजे समाप्त होगी। उदय तिथि के अनुसार सोमवार, 12 मई 2025 को कूर्म जयंती मनाई जाएगी।
Kurma Jayanti 2025: भगवान विष्णु को दशावतार माना जाता है। भगवद गीता में लिखा है कि जब-जब धरती पर पाप बढ़ा, भगवान विष्णु ने दुष्टों का नाश करने और धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए अवतार लिया। इनमें से एक था विष्णु जी का कूर्म अवतार। कूर्म यानि श्री हरि ने कछुआ बनकर संसार की रक्षा की थी। कूर्म जयंती हर साल वैशाख पूर्णिमा 2025 को मनाई जाती है। इस साल कूर्म जयंती 2025 में कब है, आइए जानते हैं तिथि और पूजा मुहूर्त और इस पर्व का महत्व।
कूर्म जयंती 2025 तिथि
कूर्म जयंती 12 मई 2025 को मनाई जाएगी। इस दिन गुरुवार भी है, जिसे भगवान विष्णु का दिन माना जाता है, ऐसे में इस पर्व का महत्व दोगुना हो गया है। कूर्म जयंती पर शाम के समय श्री हरि की पूजा की जाती है।
कूर्म जयंती 2025 समय
पंचांग के अनुसार वैशाख पूर्णिमा 11 मई 2025 को रात 08:01 बजे से शुरू होकर 12 मई 2025 को रात 10:25 बजे समाप्त होगी। उदय तिथि के अनुसार सोमवार, 12 मई 2025 को कूर्म जयंती मनाई जाएगी। कूर्म जयंती मुहूर्त - शाम 04:21 बजे से शाम 07:03 बजे तक अवधि - 02 घंटे 42 मिनट
विभिन्न पुराणों में भगवान विष्णु के कूर्म अवतार का उल्लेख मिलता है। लिंग पुराण के अनुसार जब पृथ्वी रसातल में जा रही थी, तब विष्णु ने कछुए का अवतार लेकर पृथ्वी को विनाश से बचाया था। वहीं पद्म पुराण में बताया गया है कि समुद्र मंथन के दौरान जब मंदरा पर्वत झील में डूबने लगा, तो भगवान विष्णु ने कछुए का रूप धारण कर उसे अपनी पीठ पर धारण कर लिया था। कूर्म जयंती पर भगवान विष्णु जी के कच्छप अवतार की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
कूर्म अवतार भगवान विष्णु का दूसरा अवतार है, लेकिन भागवत पुराण के अनुसार यह विष्णु जी का ग्यारहवां अवतार है। पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि दुर्वासा इंद्र से नाराज हो गए और उन्होंने देवताओं को दरिद्र होने का श्राप दे दिया और उनकी सुख-समृद्धि समाप्त कर दी। लक्ष्मी जी समुद्र में लुप्त हो गईं। तब इंद्र भगवान विष्णु के निर्देशानुसार दैत्यों और देवताओं के साथ समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए।
मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागों के राजा वासुकी को रस्सी बनाया गया, लेकिन मंदराचल के नीचे कोई आधार न होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु ने एक विशाल कछुए का रूप धारण किया और समुद्र में मंदराचल पर्वत का सहारा बने। उस दिन वैशाख मास की पूर्णिमा थी। इसके बाद मंथन पूरा हुआ।