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Shardiya Navratri: नवरात्रि में जौ बोने की परंपरा क्यों है? जानें वजह और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Shardiya Navratri: शारदीय नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के समय जौ बोने की परंपरा है। इसके लिए मिट्टी के पात्र में साफ मिट्टी डाली जाती है और उसमें जौ के बीज बोए जाते हैं।

Shardiya Navratri
Shardiya Navratri: शारदीय नवरात्रि के दौरान घरों और मंदिरों में कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। नवरात्रि के पहले दिन मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं और पूरे नौ दिनों तक इनकी पूजा की जाती है। दशमी तिथि के आसपास जब जौ अंकुरित होकर बड़े हो जाते हैं, तो इन्हें देवी का प्रसाद मानकर श्रद्धा से ग्रहण किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नवरात्रि में जौ ही क्यों बोए जाते हैं? इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है और इनका अंकुरित होना किस बात का संकेत माना जाता है? आइए जानते हैं।

कलश स्थापना के साथ बोए जाते हैं जौ

शारदीय नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के समय जौ बोने की परंपरा है। इसके लिए मिट्टी के पात्र में साफ मिट्टी डाली जाती है और उसमें जौ के बीज बोए जाते हैं। इसके बाद कलश की स्थापना कर विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा की जाती है। नवरात्रि के नौ दिनों तक जौ के पात्र को पूजा स्थल पर रखा जाता है और उसमें आवश्यकता के अनुसार पानी दिया जाता है। माना जाता है कि जिस स्थान पर देवी की पूजा की जाती है, वहां जौ का उगना शुभ माना जाता है।

जौ को क्यों माना जाता है खास

धार्मिक मान्यताओं में जौ को समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक माना गया है। हिंदू धर्म में जौ का इस्तेमाल कई धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ में किया जाता है। यज्ञ, हवन और अन्य शुभ कार्यों में भी जौ का विशेष महत्व बताया गया है। नवरात्रि में जौ बोना प्रकृति और नई शुरुआत से भी जुड़ा माना जाता है। बीज का मिट्टी में बोया जाना और कुछ ही दिनों में उसका अंकुरित होना जीवन के विकास और सृजन का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से देवी आराधना के दौरान जौ बोने की परंपरा को विशेष महत्व दिया गया है।

अंकुरित जौ से जुड़ी मान्यता

नवरात्रि के दौरान जौ के बढ़ने को लेकर भी कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि जौ जितनी तेजी से और अच्छी तरह बढ़ते हैं, घर में उतनी ही सुख-समृद्धि बनी रहती है। वहीं, जौ के कमजोर या कम बढ़ने को शुभ नहीं माना जाता है। हालांकि, जौ का अंकुरण मुख्य रूप से मिट्टी, पानी, तापमान और बीज की गुणवत्ता जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। इसलिए इसके बढ़ने को धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है, इसे भविष्यवाणी का निश्चित आधार नहीं माना जाना चाहिए।

जौ मां दुर्गा की पूजा से कैसे जुड़े

नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा शक्ति और सृजन के रूप में की जाती है। जौ का बीज मिट्टी में बोने के बाद अंकुरित होकर पौधे का रूप लेता है। इसी कारण इसे देवी शक्ति और प्रकृति की सृजनात्मक ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है। नौ दिनों तक जौ की देखभाल करना और उनके बढ़ने को देखना नवरात्रि की पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसमें प्रकृति के प्रति सम्मान और जीवन के विकास की भावना भी दिखाई देती है।

दशमी पर जौ का क्या करते हैं

नवरात्रि के नौ दिनों के बाद दशमी तिथि पर पूजा समाप्त होने के साथ जौ को भी पूजा स्थल से हटाया जाता है। कई घरों में इन अंकुरित जौ को देवी का प्रसाद मानकर परिवार के सदस्यों को दिया जाता है। लोग इन्हें अपने घर और पूजा स्थान में भी रखते हैं। कुछ स्थानों पर लोग इन जौ को अपने कानों के पीछे या सिर पर रखते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होता है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।

जौ बोने की परंपरा का धार्मिक महत्व

नवरात्रि में जौ बोने की परंपरा केवल एक धार्मिक विधि नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन चक्र से जुड़ी मान्यता भी है। एक छोटे से बीज का मिट्टी में बोए जाने के बाद अंकुरित होकर पौधे का रूप लेना नई ऊर्जा और विकास का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से नवरात्रि में कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा आज भी कई घरों में पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। नौ दिनों तक बढ़ते हुए जौ नवरात्रि की पूजा और मां दुर्गा की आराधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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