Jitiya Vrat 2026: जितिया व्रत का नाम आते ही माताओं की संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना याद आती है। इस पर्व में राजा जीमूतवाहन की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जीमूतवाहन ने दूसरों के प्राणों की रक्षा के लिए अपना जीवन तक दांव पर लगा दिया था। उनके त्याग और करुणा से जुड़ी कथा ही जितिया पर्व की परंपरा का आधार मानी जाती है, लेकिन आखिर कौन थे राजा जीमूतवाहन और उन्होंने नागराज के पुत्र की रक्षा के लिए अपना जीवन संकट में क्यों डाल दिया था? आइए जानते हैं उनकी पौराणिक कथा और जितिया व्रत से जुड़ा धार्मिक महत्व...
कौन थे राजा जीमूतवाहन?
पौराणिक कथाओं में राजा जीमूतवाहन को एक दयालु, परोपकारी और त्यागी राजकुमार के रूप में वर्णित किया गया है। वे गंधर्व वंश के राजकुमार थे। उनके पिता एक राजा थे और जीमूतवाहन का जीवन सुख-सुविधाओं के बीच बीत रहा था। हालांकि, उन्हें राजसी वैभव और सत्ता से अधिक दूसरों की सेवा करना पसंद था। कथाओं के अनुसार, जीमूतवाहन ने अपने सुख और स्वार्थ को पीछे रखकर लोककल्याण का मार्ग चुना। वे दूसरों के दुख को अपना दुख समझते थे और जरूरतमंदों की सहायता के लिए हमेशा तैयार रहते थे। उनके इसी स्वभाव के कारण उन्हें त्याग और करुणा का प्रतीक माना जाता है।
क्यों दिया अपने प्राणों का बलिदान?
राजा जीमूतवाहन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा नागों और गरुड़ से संबंधित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, नागों और गरुड़ के बीच एक ऐसा समझौता हुआ था, जिसके तहत नागों को गरुड़ के भोजन के लिए प्रतिदिन एक नाग सौंपना पड़ता था। इस कारण नागवंश के लोगों में हमेशा भय बना रहता था। एक दिन जीमूतवाहन जंगल से गुजर रहे थे।
वहां उन्होंने एक वृद्धा को रोते हुए देखा। पूछने पर पता चला कि वह नाग माता थीं और उनके पुत्र शंखचूड़ की बारी गरुड़ के सामने जाने की थी। अपने इकलौते पुत्र को खोने की आशंका से वह व्याकुल थीं। माता का दुख देखकर जीमूतवाहन का हृदय पसीज गया। उन्होंने शंखचूड़ की जान बचाने का निश्चय किया और स्वयं गरुड़ के सामने जाने का फैसला किया। वे जानते थे कि ऐसा करने पर उनकी जान भी जा सकती है, लेकिन उन्होंने अपने प्राणों की चिंता नहीं की।
गरुड़ के सामने क्यों पहुंचे जीमूतवाहन?
कथा के अनुसार, जीमूतवाहन ने शंखचूड़ के स्थान पर स्वयं को गरुड़ के हवाले कर दिया। गरुड़ उन्हें उठाकर ले गए और उन पर प्रहार करने लगे। इस दौरान भी जीमूतवाहन ने विरोध नहीं किया। उनके इस अद्भुत त्याग और साहस को देखकर गरुड़ को आश्चर्य हुआ। जब गरुड़ को जीमूतवाहन के वास्तविक परिचय और उनके बलिदान के उद्देश्य का पता चला, तो वे भावुक हो उठे।
उन्होंने जीमूतवाहन को छोड़ दिया और नागों को मारने की परंपरा समाप्त करने का संकल्प लिया। इस तरह जीमूतवाहन ने न केवल शंखचूड़ के प्राण बचाए, बल्कि नागवंश को भी भय से मुक्ति दिलाने में सहायता की। यह कथा बताती है कि जीमूतवाहन ने अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के जीवन की रक्षा को महत्व दिया। इसी कारण उन्हें महान त्याग और परोपकार का प्रतीक माना जाता है।
जितिया पर्व से क्या है संबंध?
जितिया पर्व को जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। इस पर्व में राजा जीमूतवाहन की पूजा और उनकी कथा सुनने की परंपरा प्रचलित है। धार्मिक मान्यता है कि जीमूतवाहन की कथा का स्मरण करने से संतान के कल्याण की कामना की जाती है। जिस तरह राजा जीमूतवाहन ने दूसरे के पुत्र की रक्षा के लिए अपना जीवन संकट में डाल दिया था, उसी तरह यह पर्व भी संतान के प्रति प्रेम, समर्पण और उसकी सुरक्षा की भावना से जुड़ा है।
क्या है राजा जीमूतवाहन की पूजा का महत्व?
जितिया व्रत में राजा जीमूतवाहन की पूजा को त्याग, दया और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक माना जाता है। उनकी कथा माताओं को संतान के प्रति अपने स्नेह और समर्पण की याद दिलाती है। इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं संतान की खुशहाली और दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं। इस प्रकार, राजा जीमूतवाहन की कथा जितिया पर्व के धार्मिक महत्व को समझाती है। उनका चरित्र बताता है कि दूसरों की रक्षा और भलाई के लिए किया गया त्याग भारतीय धार्मिक परंपरा में विशेष स्थान रखता है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)