Jitiya 2025: संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से माताएं सालभर में कई व्रत रखती हैं। इन्हीं में से एक है जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया या जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के कई हिस्सों में श्रद्धा के साथ रखा जाता है। इस दिन माताएं संतान के मंगल और सुरक्षा की कामना से कठिन निर्जला उपवास करती हैं। क्या आप जानते हैं कि इस साल जितिया व्रत कब रखा जाएगा, पूजा का शुभ समय क्या रहेगा और इस व्रत को करने की सही विधि क्या है? आइए जानते हैं।
कब रखा जाएगा व्रत?
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 59 मिनट से शुरू होगी और 4 अक्टूबर की सुबह 5 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। जितिया व्रत में प्रदोष काल की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। अष्टमी तिथि के दौरान 3 अक्टूबर को प्रदोष काल मिलने के कारण इस वर्ष जितिया व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा।
कब से शुरू होगा जितिया पर्व
जितिया व्रत की परंपरा केवल एक दिन के उपवास तक सीमित नहीं है। कई क्षेत्रों में इसे तीन दिनों के पर्व के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इसके बाद मुख्य व्रत के दिन महिलाएं निर्जला उपवास करती हैं और अगले दिन पारण के साथ व्रत पूरा किया जाता है।
पूजा का शुभ मुहूर्त
जितिया व्रत के दिन दिनचर्या और पूजा के लिए कई महत्वपूर्ण समय रहेंगे। 3 अक्टूबर को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 38 मिनट से 5 बजकर 26 मिनट तक रहेगा। इस समय स्नान और धार्मिक कार्य किए जा सकते हैं। वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 46 मिनट से दोपहर 12 बजकर 34 मिनट तक रहेगा।
जितिया की मुख्य पूजा प्रदोष काल में करने की परंपरा है। 3 अक्टूबर को सूर्यास्त लगभग शाम 6 बजकर 5 मिनट पर होगा। इसके बाद प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन की पूजा और व्रत कथा का श्रवण किया जा सकता है।
कैसे रखा जाता है व्रत
जीवित्पुत्रिका व्रत को कठिन निर्जला व्रत माना जाता है। व्रती महिलाएं पूरे दिन अन्न और जल का सेवन नहीं करती हैं। व्रत के दौरान संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
व्रत की शुरुआत से पहले नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद अष्टमी तिथि पर व्रती महिलाएं व्रत का संकल्प लेकर निर्जला उपवास करती हैं। शाम के समय पूजा की तैयारी की जाती है और प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। इसके साथ जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनने की भी परंपरा है।
पूजितिया व्रत की पूजा विधि
जितिया व्रत के दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और भगवान सूर्य को जल अर्पित करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। पूजा के लिए घर में किसी साफ स्थान पर चौकी रखें और उस पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं। चौकी पर भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके साथ मिट्टी या कुश से बनी जीमूतवाहन की प्रतिमा रखने की भी परंपरा है। पूजा स्थल पर धूप और दीप जलाएं। इसके बाद भगवान जीमूतवाहन को रोली, अक्षत, फूल, माला और सिंदूर अर्पित करें।
पूजा में पान, सुपारी, फल, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इसके बाद हाथ में अक्षत और फूल लेकर संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करें। इसके बाद भगवान जीमूतवाहन की पूजा करते हुए जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनें या पढ़ें। व्रत कथा के साथ चील और सियार की कथा सुनने की भी परंपरा है। कथा पूरी होने के बाद भगवान जीमूतवाहन की आरती करें और परिवार तथा संतान के मंगल की प्रार्थना करें।
जीमूतवाहन की पूजा क्यों करते हैं?
जीवित्पुत्रिका व्रत में गंधर्वराज जीमूतवाहन की पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक कथा के अनुसार जीमूतवाहन ने एक नाग की रक्षा के लिए अपना जीवन संकट में डाल दिया था। उनकी करुणा, त्याग और साहस से जुड़ी इसी कथा को संतान की रक्षा और कल्याण की भावना से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि जीमूतवाहन की पूजा और व्रत कथा का श्रवण करने से संतान के जीवन में आने वाले संकट दूर होते हैं और उन्हें दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। यही वजह है कि जितिया के दिन जीमूतवाहन की पूजा को विशेष स्थान दिया गया है।
जितिया व्रत का धार्मिक महत्व
जितिया व्रत को मातृत्व की आस्था और संतान के प्रति समर्पण से जुड़ा पर्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना पूरी होती है।
कब होगा व्रत का पारण
जितिया व्रत को कठिन निर्जला उपवास माना जाता है। इसमें व्रती के लिए जल ग्रहण करना भी वर्जित रहता है। यह उपवास एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक रखने की परंपरा है। इस वर्ष जितिया व्रत की तिथि 4 अक्तूबर को सुबह 6 बजकर 15 बजे तक रहेगी। इसके बाद व्रती पारण कर सकेंगी। यानी 4 अक्तूबर को सुबह 6 बजकर 15 मिनट के बाद जितिया व्रत का पारण किया जाएगा।
व्रत का फल
माताओं के लिए यह व्रत केवल उपवास और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि संतान के प्रति उनके स्नेह, समर्पण और मंगलकामना से जुड़ा पर्व है। पूरे दिन श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करने, व्रत कथा सुनने और परिवार की सुख-शांति की कामना करने से इस पर्व की धार्मिक भावना पूरी होती है। यही वजह है कि आज भी जितिया व्रत को मातृत्व की आस्था और पारिवारिक परंपरा से जुड़े महत्वपूर्ण पर्व के रूप में मनाया जाता है।
यह भी पढ़ें-
(
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)