हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जानकी जयंती मनाई जाती है। जानकी जयंती को सीता अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। इस साल सीता अष्टमी 21 फरवरी को पड़ रही है।
हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जानकी जयंती मनाई जाती है। जानकी जयंती को सीता अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। इस साल सीता अष्टमी 21 फरवरी को पड़ रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मिथिला नरेश राजा जनक की प्रिय पुत्री सीता जी का जन्म फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था।
जानकी जयंती के दिन माता सीता की विधि-विधान से पूजा की जाती है. माता सीता के साथ भगवान श्री राम की भी पूजा की जाती है. इस दिन माता सीता की पूजा में वस्त्र और श्रृंगार का सामान चढ़ाया जाता है. मान्यता है कि इस दिन माता सीता की पूजा करने से वैवाहिक जीवन की परेशानियां दूर होती हैं. सीता जयंती का महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सीता अष्टमी का व्रत करने से विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं. जीवनसाथी को लंबी आयु प्राप्त होती है. इसके साथ ही इस व्रत को करने से सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन करने जितना फल मिलता है.
सीता जयंती का मुहूर्त
21 फरवरी 2025, शुक्रवार को जानकी जयंती
अष्टमी तिथि आरंभ- 20 फरवरी 2025 सुबह 09:58 बजे अष्टमी तिथि समाप्त - 21 फरवरी 2025 प्रातः 11:57 बजे
सीता माता की पूजा का शुभ समय और योग
ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 05:13 बजे से प्रातः 06:03 बजे तक प्रातः सायं 05:38 बजे से प्रातः 06:54 बजे तक अभिजीत मुहूर्त 12:12 अपराह्न से 12:58 अपराह्न तक विजय मुहूर्त 02:28 अपराह्न से 03:14 अपराह्न तक गोधूलि मुहूर्त शाम 06:13 बजे से शाम 06:39 बजे तक शाम 06:16 बजे से शाम 07:31 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग प्रातः 06:54 बजे से अपराह्न 03:54 बजे तक निशिता मुहूर्त प्रातः 12:09 बजे, 22 फरवरी से दोपहर 01:00 बजे तक, 22 फरवरी
सीता अष्टमी ऐसे करें और करें पूजा
- सीता अष्टमी के दिन सुबह स्नान करके माता सीता और भगवान श्री राम को प्रणाम करें और व्रत रखने का संकल्प लें.
- माता सीता और भगवान श्री राम की पूजा करें. सबसे पहले व्रती को भगवान गणपति और माता अंबिका की पूजा करनी चाहिए.
- माता सीता और भगवान श्री राम की पूजा करते समय माता सीता को पीले फूल, वस्त्र और सोलह श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें।
- भोग में पीली चीजें अर्पित करें।
- इसके बाद माता सीता की आरती करें।
- दूध और गुड़ से बने व्यंजन दान करें।
- शाम को पूजा करने के बाद व्रती को इन व्यंजनों को खाकर अपना व्रत खोलना चाहिए।