Hariyali Teej: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हरियाली तीज का संबंध भगवान शिव और मां पार्वती के विवाह से है। कहा जाता है कि मां पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी।
Hariyali Teej Vrat Katha: हरियाली तीज हिंदू धर्म के प्रमुख व्रत-त्योहारों में से एक है, जिसे विशेष रूप से भगवान शिव और मां पार्वती के मिलन से जोड़कर देखा जाता है। सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाने वाली हरियाली तीज पर महिलाएं माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं। इस दिन मां पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना करने की धार्मिक परंपरा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हरियाली तीज का संबंध केवल सावन और सुहाग से ही नहीं, बल्कि मां पार्वती की वर्षों की कठोर तपस्या और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की पौराणिक कथा से भी है? आइए जानते हैं हरियाली तीज से जुड़ी पूरी पौराणिक कथा और इस व्रत के पीछे की धार्मिक मान्यता...
हरियाली तीज क्यों मनाई जाती है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हरियाली तीज का संबंध भगवान शिव और मां पार्वती के विवाह से है। कहा जाता है कि मां पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी। उनकी इसी तपस्या और अटूट संकल्प के बाद भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
मान्यता है कि सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान शिव और मां पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था। इसी कारण इस दिन मां पार्वती की पूजा विशेष रूप से की जाती है। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं, जबकि कई स्थानों पर अविवाहित कन्याएं भी अच्छे वर की प्राप्ति के लिए मां पार्वती की पूजा करती हैं।
मां पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए की कठोर तपस्या
हरियाली तीज की कथा मां पार्वती के पूर्व जन्म से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार मां पार्वती पूर्व जन्म में राजा दक्ष की पुत्री सती थीं। उनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। लेकिन एक समय राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया और उसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। माता सती अपने पिता के यज्ञ में बिना बुलाए ही पहुंच गईं। वहां उन्होंने भगवान शिव के प्रति अपने पिता का अपमानजनक व्यवहार देखा। पति का अपमान सहन न कर पाने के कारण माता सती ने उसी यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।
इसके बाद भगवान शिव अत्यंत दुखी हो गए। माता सती ने अगले जन्म में हिमालयराज के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। उनका नाम पार्वती रखा गया। बाल्यकाल से ही मां पार्वती भगवान शिव को अपना पति मानती थीं। जब माता पार्वती विवाह योग्य हुईं तो उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने का संकल्प लिया। भगवान शिव उस समय संसार से विरक्त होकर तपस्या में लीन थे। उन्हें गृहस्थ जीवन में लाना आसान नहीं था। माता पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या शुरू कर दी।
मां पार्वती की वर्षों तक चली तपस्या
पौराणिक कथा के अनुसार मां पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कई वर्षों तक कठोर तप किया। उन्होंने सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया और भगवान शिव का ध्यान करते हुए कठिन साधना में लीन रहीं। कहा जाता है कि माता पार्वती ने कभी केवल फल खाकर तो कभी सूखे पत्तों का सेवन करके तपस्या की। बाद में उन्होंने अन्न और जल तक का त्याग कर दिया और पूरी तरह भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं।
माता पार्वती की तपस्या इतनी कठोर थी कि देवताओं ने भी उनके संकल्प को देखा। उनकी तपस्या का उद्देश्य केवल भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना था। लंबे समय तक तपस्या करने के बाद भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए।
भगवान शिव ने मां पार्वती को दिया विवाह का वरदान
मां पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके सामने प्रकट हुए। उन्होंने माता पार्वती की इच्छा पूछी, तब मां पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने की अपनी इच्छा प्रकट की। भगवान शिव ने माता पार्वती की तपस्या और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें विवाह का वरदान दिया। इसके बाद भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। इसी पौराणिक प्रसंग को हरियाली तीज के व्रत से जोड़ा जाता है।
हरियाली तीज पर मां पार्वती की पूजा का विशेष महत्व
हरियाली तीज के दिन मां पार्वती के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। कई स्थानों पर माता को सुहाग की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं। इसमें सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी, मेहंदी, वस्त्र, आभूषण और अन्य श्रृंगार सामग्री शामिल होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां पार्वती अखंड सौभाग्य की देवी मानी जाती हैं। इसलिए विवाहित महिलाएं इस दिन माता की पूजा करके अपने पति की लंबी आयु और वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। कई क्षेत्रों में हरियाली तीज के दिन माता पार्वती की प्रतिमा या तस्वीर को सजाया जाता है। उन्हें नए वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं। इसके बाद भगवान शिव और मां पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)