Aja Ekadashi: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। सनातन धर्म में एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है और वर्ष की सभी एकादशियों में अजा एकादशी का भी विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। पुराणों में इस एकादशी के व्रत और भगवान विष्णु की आराधना का वर्णन मिलता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष की इस एकादशी को ‘अजा’ नाम क्यों दिया गया? इस नाम के पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी है और राजा हरिश्चंद्र का इससे क्या संबंध है?
अजा एकादशी की कथा का वर्णन भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था। इस कथा में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के जीवन में आए कठिन समय और अजा एकादशी के व्रत से जुड़े प्रसंग का उल्लेख मिलता है।
अजा एकादशी का नाम कैसे पड़ा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। ‘अजा’ नाम को लेकर विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। एकादशी महात्म्य में इस तिथि की महिमा राजा हरिश्चंद्र की कथा के माध्यम से बताई गई है। पद्म पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में एकादशी व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। अजा एकादशी को भगवान विष्णु की आराधना और व्रत के लिए विशेष माना गया है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु का पूजन करते हैं और एकादशी व्रत का पालन करते हैं।
राजा हरिश्चंद्र की पौराणिक कथा
अजा एकादशी की कथा का सबसे प्रमुख प्रसंग सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र से जुड़ा है। राजा हरिश्चंद्र अयोध्या के प्रसिद्ध राजा थे। वे सत्य के पालन के लिए जाने जाते थे और उनके राज्य में प्रजा सुखी थी। राजा हरिश्चंद्र के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने किसी भी परिस्थिति में सत्य का साथ नहीं छोड़ा।
एक समय महर्षि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा की परीक्षा लेने का निश्चय किया। इस परीक्षा के दौरान राजा हरिश्चंद्र को अपना राजपाट तक त्यागना पड़ा। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें अपना राज्य, धन और वैभव छोड़कर वन की ओर जाना पड़ा। राजा ने अपना वचन निभाने के लिए अपने परिवार तक का त्याग कर दिया। उनकी पत्नी शैव्या और पुत्र रोहिताश्व भी उनके साथ थे। राजपाट छूट जाने के बाद परिवार के सामने जीवन-यापन का संकट खड़ा हो गया।
राजा हरिश्चंद्र ने पत्नी और पुत्र को भी बेच दिया
कथा के अनुसार जब राजा हरिश्चंद्र के पास देने के लिए कुछ भी नहीं बचा, तब उन्हें अपने वचन को पूरा करने के लिए अपनी पत्नी और पुत्र तक को बेचने की स्थिति का सामना करना पड़ा। उनकी पत्नी शैव्या को एक ब्राह्मण के घर सेवा के लिए जाना पड़ा और पुत्र भी उनके साथ चला गया।
इसके बाद राजा हरिश्चंद्र ने स्वयं को भी बेच दिया। वे एक चांडाल के यहां काम करने लगे। उन्हें श्मशान घाट पर मृत लोगों के अंतिम संस्कार के लिए कर वसूलने का काम मिला। जिस राजा के पास कभी विशाल राज्य और अपार संपत्ति थी, वही अब श्मशान घाट पर रहने और वहां आने वाले लोगों से अंतिम संस्कार का शुल्क लेने के लिए विवश था। इसके बावजूद उन्होंने सत्य का त्याग नहीं किया।
पुत्र रोहिताश्व की मृत्यु
राजा हरिश्चंद्र की कठिन परीक्षा यहीं समाप्त नहीं हुई। कथा के अनुसार एक दिन उनका पुत्र रोहिताश्व फूल लेने के लिए गया था। उसी दौरान उसे सर्प ने डस लिया और उसकी मृत्यु हो गई। शैव्या अपने मृत पुत्र के शरीर को लेकर श्मशान घाट पहुंचीं। उस समय राजा हरिश्चंद्र ही वहां अंतिम संस्कार का शुल्क लेने का काम कर रहे थे। अंधेरा होने के कारण उन्हें पहले यह पता नहीं चला कि सामने उनकी अपनी पत्नी खड़ी है।
जब उन्होंने शैव्या को पहचान लिया और देखा कि उनकी गोद में उनके पुत्र का मृत शरीर है, तो दोनों का दुख और बढ़ गया। लेकिन राजा हरिश्चंद्र अपने कर्तव्य और सत्य के पालन से पीछे नहीं हटे। उन्होंने शैव्या से कहा कि अंतिम संस्कार के लिए श्मशान का शुल्क देना होगा। शैव्या के पास उस समय देने के लिए कुछ भी नहीं था। उन्होंने अपने वस्त्र का एक हिस्सा देने की बात कही, लेकिन राजा हरिश्चंद्र ने नियम का पालन करना आवश्यक बताया।
विपत्ति के बीच आया अजा एकादशी का प्रसंग
कथा के अनुसार इसी कठिन समय में राजा हरिश्चंद्र को महर्षि गौतम के दर्शन हुए। महर्षि गौतम ने राजा को भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी के व्रत की महिमा बताई। महर्षि ने राजा को बताया कि अजा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और विधिपूर्वक इस व्रत का पालन करने से पापों का क्षय होता है तथा भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। राजा हरिश्चंद्र ने महर्षि गौतम द्वारा बताए गए विधि-विधान के अनुसार अजा एकादशी का व्रत किया और भगवान विष्णु की आराधना की। व्रत के प्रभाव से उनके जीवन में चल रहा संकट समाप्त होने लगा।
भगवान विष्णु की कृपा से वापस मिला राज्य और परिवार
अजा एकादशी का व्रत पूर्ण होने के बाद राजा हरिश्चंद्र के जीवन में बड़ा परिवर्तन आया। धार्मिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु की कृपा से उनके पुत्र रोहिताश्व को जीवन प्राप्त हुआ। उनके परिवार की कठिनाइयां समाप्त हुईं और राजा को उनका खोया हुआ राज्य तथा वैभव भी वापस मिल गया। कथा में यह भी बताया गया है कि राजा हरिश्चंद्र को उनकी सत्यनिष्ठा और अजा एकादशी के व्रत के फलस्वरूप भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने फिर से अपने राज्य का संचालन किया।
अजा एकादशी का धार्मिक महत्व
अजा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित प्रमुख एकादशी तिथियों में मानी जाती है। धार्मिक ग्रंथों में एकादशी व्रत को भगवान विष्णु की उपासना का विशेष अवसर बताया गया है। इस दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन करते हैं और व्रत का संकल्प लेते हैं। पूजा में भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी दल, फल और नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा है। एकादशी के दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी किया जाता है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार निर्जल या फलाहार व्रत रखते हैं।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)