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Sarvapitri Amavasya: सर्वपितृ अमावस्या क्यों मानी जाती है सबसे खास? जानें इस दिन श्राद्ध करने का महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Sarvapitri Amavasya: सर्वपितृ अमावस्या नाम का संबंध ही सभी पितरों से है। इस दिन किसी एक विशेष तिथि पर दिवंगत हुए पूर्वज के बजाय परिवार के सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के लिए श्राद्ध किया जा सकता है।

सर्वपितृ अमावस्या
Sarvapitri Amavasya: पितृ पक्ष में हर तिथि का अपना महत्व माना गया है, लेकिन सर्वपितृ अमावस्या को विशेष स्थान दिया जाता है। यह पितृ पक्ष की अंतिम तिथि होती है और इस दिन उन पितरों के लिए भी श्राद्ध किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है। यही वजह है कि इसे सर्वपितृ अमावस्या, सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या और महालय अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को पड़ रही है। लेकिन आखिर इस अमावस्या को इतना खास क्यों माना जाता है और इस दिन किन पितरों के लिए श्राद्ध किया जाता है? आइए जानते हैं।

सर्वपितृ अमावस्या का महत्व

सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष की आखिरी तिथि होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सभी ज्ञात और अज्ञात पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु की तिथि परिवार को मालूम नहीं है, उनके लिए भी इस दिन श्राद्ध करने की परंपरा है। मान्यता है कि अगर किसी कारण से पितृ पक्ष की संबंधित तिथि पर किसी पूर्वज का श्राद्ध नहीं किया जा सका हो, तो सर्वपितृ अमावस्या पर उनके निमित्त श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है। इसी कारण यह तिथि उन परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिन्हें अपने पूर्वजों की श्राद्ध तिथि की सही जानकारी नहीं है। 

क्यों कहलाती है सर्वपितृ अमावस्या?

सर्वपितृ अमावस्या नाम का संबंध ही सभी पितरों से है। इस दिन किसी एक विशेष तिथि पर दिवंगत हुए पूर्वज के बजाय परिवार के सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के लिए श्राद्ध किया जा सकता है, इसलिए इसे सर्वपितरों को समर्पित अमावस्या माना जाता है। धार्मिक मान्यता में पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय माना गया है। पितृ पक्ष के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या पर परिवार के उन सभी पितरों को याद किया जाता है, जिनका नियमित रूप से श्राद्ध करना संभव नहीं हो पाता।

किस पितर का कर सकते हैं श्राद्ध?

सर्वपितृ अमावस्या पर उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है। इसके अलावा यदि किसी कारण से किसी पितर का श्राद्ध उनकी निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया हो, तो उनके लिए भी इस दिन श्राद्ध करने की मान्यता है। अमावस्या, पूर्णिमा और चतुर्दशी तिथि को मृत्यु होने वाले परिवार के सदस्यों के लिए भी अमावस्या श्राद्ध किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिन पितरों की मृत्यु की तिथि भूल गई हो या ज्ञात न हो, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करना विशेष माना जाता है। 

श्राद्ध और तर्पण का महत्व

इस दिन श्राद्ध कर्म के साथ पितरों का तर्पण किया जाता है। श्राद्ध में पितरों को श्रद्धापूर्वक अर्पण किया जाता है और तर्पण के माध्यम से जल अर्पित कर उन्हें स्मरण किया जाता है। पितृ पक्ष के श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप और रौहिण जैसे मुहूर्त महत्वपूर्ण माने जाते हैं और श्राद्ध के अंत में तर्पण किया जाता है। 

2026 में कब है सर्वपितृ अमावस्या?

पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को होगी। अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर की रात 9 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 10 अक्टूबर की रात 9 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। स्थान के अनुसार श्राद्ध के मुहूर्त में कुछ अंतर हो सकता है।

इस दिन क्यों किया जाता है पिंडदान?

सर्वपितृ अमावस्या पर पिंडदान भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पिंडदान के माध्यम से पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए भी इस दिन पिंडदान और श्राद्ध किया जा सकता है। इसी वजह से सर्वपितृ अमावस्या को पितृ पक्ष की सबसे महत्वपूर्ण तिथियों में गिना जाता है। यह उन परिवारों के लिए विशेष अवसर होता है जो अपने सभी पूर्वजों का स्मरण एक साथ करना चाहते हैं।

पितरों के लिए दान का महत्व

सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध के साथ दान-पुण्य करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जरूरतमंदों को भोजन कराना, वस्त्र और तिल का दान करना तथा जल अर्पित करना शुभ माना जाता है। हालांकि इस दिन किए जाने वाले कर्मकांड का मुख्य उद्देश्य पितरों का स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना ही माना गया है। इसलिए श्राद्ध में दिखावे के बजाय श्रद्धा और विधि का ध्यान रखने की परंपरा रही है।

सर्वपितृ अमावस्या इसलिए है खास

सर्वपितृ अमावस्या की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह केवल किसी एक पितर की तिथि तक सीमित नहीं रहती। इस दिन उन सभी पूर्वजों को स्मरण करने का अवसर मिलता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारण से निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया। इसी कारण पितृ पक्ष के समापन पर आने वाली यह अमावस्या पितरों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और तर्पण के लिए विशेष मानी जाती है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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