Pitru Paksha 2026: पितृ पक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान का विशेष महत्व बताया गया है। इसी क्रम में पूर्णिमा श्राद्ध का भी खास स्थान माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पवित्र नदी या जलाशय में स्नान करने, सूर्य को अर्घ्य देने और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। माना जाता है कि स्नान-दान के जरिए व्यक्ति स्वयं को शुद्ध करके पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों की शुरुआत करता है। लेकिन पूर्णिमा श्राद्ध के दिन स्नान और दान को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है? क्या आपको पता है इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है? आइए जानते हैं।
पूर्णिमा श्राद्ध का क्या महत्व है
पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा से मानी जाती है। इसी वजह से पूर्णिमा के दिन किए जाने वाले श्राद्ध को पूर्णिमा श्राद्ध कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में पितृ पक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके लिए श्राद्ध कर्म करने का समय माना गया है। पूर्णिमा श्राद्ध के दिन पितरों का तर्पण, श्राद्ध कर्म और पिंडदान करने के साथ स्नान-दान का भी विधान बताया गया है। इस दिन श्रद्धालु पवित्र जल में स्नान करके पितरों के निमित्त पूजा और तर्पण करते हैं।
स्नान को क्यों माना जाता है जरूरी
धार्मिक परंपरा में किसी भी पूजा या धार्मिक अनुष्ठान से पहले स्नान करके शरीर और मन की शुद्धि करने का विधान है। पितृ पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध कर्म में भी स्नान को इसी शुद्धिकरण से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि स्नान के बाद व्यक्ति स्वच्छ होकर पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर्म करता है। यदि संभव हो तो इस दिन गंगा, यमुना या किसी अन्य पवित्र नदी में स्नान करने की परंपरा है। नदी में स्नान संभव न हो तो घर पर पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।
सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा
पूर्णिमा श्राद्ध के दिन स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सूर्य को देवताओं और पितरों तक अर्पित जल पहुंचाने वाला माध्यम माना गया है। इसी कारण स्नान के बाद सूर्य देव को जल अर्पित करके पितरों का स्मरण किया जाता है। इसके बाद तर्पण और श्राद्ध से जुड़े कर्म किए जाते हैं।
दान का क्यों है महत्व
पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण के साथ दान को भी महत्वपूर्ण माना गया है। पूर्णिमा श्राद्ध के दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, वस्त्र, फल, तिल या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों के निमित्त किया गया दान पुण्यदायी माना जाता है। दान करते समय दिखावे के बजाय श्रद्धा और सामर्थ्य का ध्यान रखने की बात कही गई है।
किन चीजों का कर सकते हैं दान
पूर्णिमा श्राद्ध के दिन अन्न और वस्त्र का दान विशेष रूप से किया जाता है। इसके अलावा काले तिल, गुड़, घी, फल और जरूरत के अनुसार अन्य वस्तुओं का दान भी किया जा सकता है। श्राद्ध कर्म में तिल का विशेष महत्व माना गया है, इसलिए पितरों के तर्पण में तिल का प्रयोग करने और दान करने की भी परंपरा है। दान हमेशा अपनी क्षमता के अनुसार ही करना चाहिए।
स्नान-दान के बाद करें तर्पण
स्नान और दान के बाद पितरों का तर्पण किया जाता है। तर्पण के दौरान जल में काले तिल मिलाकर पितरों का स्मरण करते हुए जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद श्राद्ध कर्म और पिंडदान आदि परंपराओं का पालन किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृ पक्ष में किए गए इन कर्मों का उद्देश्य पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करना है, इसलिए पूर्णिमा श्राद्ध के दिन स्नान, तर्पण और दान को एक साथ करने की परंपरा रही है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)