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Sanatan Dharma: मोक्ष को ही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य क्यों माना गया है? जानिए धार्मिक मान्यता

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Sanatan Dharma: गरुड़ पुराण, भगवद्गीता और उपनिषदों में बताया गया है कि जन्म और मृत्यु का चक्र कर्मों के कारण चलता रहता है। हर जन्म में मनुष्य सुख-दुख, लाभ-हानि, रोग, वृद्धावस्था और मृत्यु का अनुभव करता है।

Sanatan Dharma
Sanatan Dharma: सनातन धर्म में मानव जीवन को केवल जन्म लेने, परिवार चलाने और सांसारिक सुख प्राप्त करने तक सीमित नहीं माना गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार मनुष्य का जन्म अत्यंत दुर्लभ होता है और इसका उद्देश्य आत्मा की उन्नति तथा परमात्मा की प्राप्ति है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में मोक्ष को मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य बताया गया है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर मोक्ष को ही सबसे श्रेष्ठ क्यों माना गया? क्या केवल अच्छे कर्म करने से मोक्ष मिल जाता है या इसके लिए कोई विशेष मार्ग भी बताया गया है? आइए जानते हैं धार्मिक मान्यता के अनुसार मोक्ष का वास्तविक अर्थ और उसका महत्व...

क्या होता है मोक्ष?

सनातन धर्म में मोक्ष का अर्थ जन्म और मृत्यु के अनंत चक्र से मुक्ति प्राप्त करना है। धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रत्येक जीव की आत्मा अमर होती है, जबकि शरीर नश्वर होता है। जब तक आत्मा कर्मों के बंधन में रहती है, तब तक उसे बार-बार अलग-अलग योनियों में जन्म लेना पड़ता है। जब आत्मा अपने समस्त कर्मों के बंधन से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन हो जाती है, उसी अवस्था को मोक्ष कहा जाता है। इसे मुक्ति, कैवल्य और परमगति जैसे नामों से भी जाना जाता है। शास्त्रों में इसे आत्मा की सर्वोच्च अवस्था माना गया है।

चार पुरुषार्थों में मोक्ष का स्थान

सनातन धर्म में मानव जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ बताए गए हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

धर्म का अर्थ है कर्तव्यों का पालन और धार्मिक आचरण। अर्थ का संबंध जीवनयापन के लिए धन और संसाधनों की प्राप्ति से है। काम का अर्थ है जीवन की उचित इच्छाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति। इन तीनों पुरुषार्थों का पालन करते हुए मनुष्य को अंततः मोक्ष की प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार धर्म, अर्थ और काम सांसारिक जीवन को व्यवस्थित करते हैं, जबकि मोक्ष आत्मा को परम शांति और परमात्मा से एकत्व की ओर ले जाता है। इसी कारण इसे अंतिम और सर्वोच्च पुरुषार्थ कहा गया है।

बार-बार जन्म लेने से मुक्ति क्यों आवश्यक मानी गई?

गरुड़ पुराण, भगवद्गीता और उपनिषदों में बताया गया है कि जन्म और मृत्यु का चक्र कर्मों के कारण चलता रहता है। हर जन्म में मनुष्य सुख-दुख, लाभ-हानि, रोग, वृद्धावस्था और मृत्यु का अनुभव करता है। धार्मिक मान्यता है कि जब तक कर्मों का बंधन समाप्त नहीं होता, तब तक आत्मा संसार में आती-जाती रहती है। मोक्ष मिलने पर आत्मा इस चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाती है। इसलिए मोक्ष को सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया है।

भगवद्गीता में मोक्ष का महत्व

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा और मोक्ष का गूढ़ ज्ञान दिया है। गीता के अनुसार आत्मा न कभी जन्म लेती है और न ही उसका कभी विनाश होता है। शरीर बदलता है, लेकिन आत्मा शाश्वत रहती है। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति निष्काम भाव से अपने कर्तव्य का पालन करता है, मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है तथा परमात्मा में अटूट श्रद्धा रखता है, वह धीरे-धीरे मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ता है। गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म- तीनों मार्गों को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया गया है।

उपनिषदों में मोक्ष की अवधारणा

उपनिषदों में आत्मा और ब्रह्म को एक ही तत्व माना गया है। वहां बताया गया है कि अज्ञान के कारण मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मान बैठता है, जबकि वास्तविकता में वह परमात्मा का ही अंश है। जब साधक आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है और अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तब उसका अज्ञान समाप्त हो जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यही आत्मज्ञान मोक्ष का द्वार खोलता है।

क्या केवल संन्यास लेने से मोक्ष मिलता है?

धार्मिक ग्रंथों में ऐसा कहीं नहीं कहा गया कि केवल संन्यास लेने वाला व्यक्ति ही मोक्ष प्राप्त कर सकता है। अनेक महापुरुषों और राजर्षियों ने गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उच्च आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त की। सनातन धर्म के अनुसार यदि कोई व्यक्ति सत्य, अहिंसा, दया, सेवा, संयम और ईश्वर भक्ति के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करता है तथा अपने कर्मों को परमात्मा को समर्पित करता है, तो वह भी मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है।

मोक्ष प्राप्ति के लिए कौन-कौन से मार्ग बताए गए हैं?

  • ज्ञान योग के माध्यम से व्यक्ति आत्मा और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रयास करता है।
  • भक्ति योग में साधक पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ ईश्वर की उपासना करता है।
  • कर्म योग में बिना किसी फल की इच्छा के अपने कर्तव्यों का पालन किया जाता है।
  • राजयोग और ध्यान के माध्यम से मन को स्थिर करके आत्मचिंतन किया जाता है। 

मोक्ष और कर्म का क्या संबंध है?

सनातन धर्म में कर्म का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। हर व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार फल प्राप्त करता है। अच्छे कर्म पुण्य देते हैं और बुरे कर्म पाप का कारण बनते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब व्यक्ति निष्काम भाव से कर्म करता है और अपने सभी कार्यों को ईश्वर को समर्पित कर देता है, तब नए कर्मबंधन नहीं बनते। धीरे-धीरे पुराने कर्म भी समाप्त होने लगते हैं और आत्मा मोक्ष की ओर अग्रसर होती है।

क्या सभी जीवों के लिए मोक्ष संभव है?

धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रत्येक जीव की आत्मा अंततः मोक्ष प्राप्त करने की क्षमता रखती है। हालांकि मनुष्य योनि को सबसे श्रेष्ठ इसलिए कहा गया है क्योंकि इसी जन्म में विवेक, ज्ञान, साधना और ईश्वर भक्ति के माध्यम से आत्मिक उन्नति संभव मानी गई है। शास्त्रों में कहा गया है कि देवता भी कभी-कभी मनुष्य जन्म की कामना करते हैं, क्योंकि मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम अवसर मानव जीवन में ही उपलब्ध होता है।




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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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