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Durga Saptashati: दुर्गा सप्तशती पाठ का क्या महत्व है? जानिए कब और क्यों किया जाता है इसका पाठ

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Durga Saptashati: शास्त्रों में दुर्गा सप्तशती को देवी का साक्षात स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि जिस स्थान पर श्रद्धापूर्वक इसका पाठ किया जाता है, वहां देवी की विशेष कृपा बनी रहती है। 

Durga Saptashati
Durga Saptashati: सनातन धर्म में मां दुर्गा की उपासना के अनेक स्वरूप बताए गए हैं, लेकिन दुर्गा सप्तशती का पाठ सबसे प्रभावशाली और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह ग्रंथ मार्कण्डेय पुराण का एक प्रमुख भाग है, जिसमें देवी की महिमा, उनके विभिन्न स्वरूपों तथा असुरों के संहार का विस्तृत वर्णन मिलता है। शास्त्रों के अनुसार दुर्गा सप्तशती केवल स्तुति का ग्रंथ नहीं, बल्कि देवी की दिव्य लीलाओं का संपूर्ण वर्णन है। इसी कारण नवरात्रि, गुप्त नवरात्रि, अष्टमी, नवमी और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों में इसका पाठ अत्यंत श्रद्धा के साथ किया जाता है।

दुर्गा सप्तशती में कुल 700 श्लोक हैं, इसलिए इसे "सप्तशती" कहा जाता है। इस ग्रंथ में देवी के महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती स्वरूपों का विस्तार से वर्णन मिलता है। आइए जानते हैं कि दुर्गा सप्तशती पाठ का धार्मिक महत्व क्या है, इसका पाठ कब किया जाता है और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।

क्या है दुर्गा सप्तशती?

दुर्गा सप्तशती को देवी माहात्म्य या चंडी पाठ भी कहा जाता है, जो मार्कण्डेय पुराण के 81वें से 93वें अध्याय तक का भाग है। इसमें कुल 13 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इस ग्रंथ में देवी की महिमा का वर्णन तीन प्रमुख चरित्रों के माध्यम से किया गया है। पहले अध्याय में महाकाली द्वारा मधु और कैटभ नामक असुरों के वध का वर्णन है। दूसरे अध्याय में महालक्ष्मी द्वारा महिषासुर के संहार की कथा आती है। तीसरे अध्याय में महासरस्वती के रूप में देवी द्वारा शुंभ, निशुंभ, धूम्रलोचन, चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे असुरों का वध वर्णित है। इन्हीं दिव्य लीलाओं के कारण इस ग्रंथ को देवी उपासना का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना गया है।

 

Durga Saptashati

दुर्गा सप्तशती पाठ का धार्मिक महत्व

शास्त्रों में दुर्गा सप्तशती को देवी का साक्षात स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि जिस स्थान पर श्रद्धापूर्वक इसका पाठ किया जाता है, वहां देवी की विशेष कृपा बनी रहती है। यही कारण है कि देवी मंदिरों, शक्ति पीठों और नवरात्रि के अनुष्ठानों में इसका नियमित पाठ किया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार सप्तशती के प्रत्येक अध्याय का अपना अलग महत्व है। किसी विशेष उद्देश्य से संपूर्ण पाठ, नवचंडी पाठ अथवा चयनित अध्यायों का भी पाठ किया जाता है। हालांकि, शास्त्रों में पूर्ण विधि से संपूर्ण पाठ को सर्वोत्तम माना गया है।

दुर्गा सप्तशती की पौराणिक कथा

मार्कण्डेय पुराण में वर्णित कथा के अनुसार एक समय राजा सुरथ अपने राज्य से पराजित होकर वन में चले गए। दूसरी ओर समाधि नामक एक वैश्य भी अपने परिवार द्वारा त्याग दिए जाने के बाद उसी वन में पहुंचे। दोनों अत्यंत दुखी थे और अपने जीवन की परिस्थितियों का कारण समझ नहीं पा रहे थे। वन में उनकी भेंट महर्षि मेधा से हुई। उन्होंने ऋषि से पूछा कि सब कुछ छिन जाने के बाद भी उनका मन बार-बार उन्हीं लोगों और वस्तुओं की ओर क्यों आकर्षित होता है, तब महर्षि मेधा ने उन्हें देवी महामाया की शक्ति का वर्णन करते हुए देवी माहात्म्य का उपदेश दिया।

ऋषि ने बताया कि समस्त संसार देवी की योगमाया के प्रभाव से संचालित होता है। इसके बाद उन्होंने देवी के विभिन्न अवतारों और असुरों के संहार की दिव्य कथाएं सुनाईं, जिन्हें आज दुर्गा सप्तशती के नाम से जाना जाता है। ऋषि के उपदेश के बाद राजा सुरथ और वैश्य समाधि ने नदी के तट पर जाकर देवी भगवती की कठोर आराधना की। दोनों ने कई दिनों तक उपवास, जप और देवी की स्तुति की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां दुर्गा प्रकट हुईं और वरदान दिया।

राजा सुरथ ने अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने की कामना की। देवी ने उन्हें पुनः राज्य प्राप्त होने का वरदान दिया और भविष्य में सावर्णि मनु बनने का आशीर्वाद भी प्रदान किया। वहीं वैश्य समाधि ने संसार के मोह से मुक्ति और आत्मज्ञान की इच्छा व्यक्त की। देवी ने उन्हें ज्ञान और मोक्ष का वरदान दिया। इसी प्रसंग के माध्यम से महर्षि मेधा द्वारा सुनाई गई देवी की महिमा आगे चलकर दुर्गा सप्तशती के रूप में प्रसिद्ध हुई।

 

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दुर्गा सप्तशती में किन-किन असुरों के वध का वर्णन मिलता है?

दुर्गा सप्तशती में देवी द्वारा अनेक शक्तिशाली असुरों के संहार का विस्तार से वर्णन है। सबसे पहले भगवान विष्णु के कानों के मैल से उत्पन्न मधु और कैटभ नामक असुरों का वध महाकाली के सहयोग से होता है। इसके बाद महिषासुर अत्यंत बलशाली होकर तीनों लोकों पर अधिकार कर लेता है, तब सभी देवताओं के तेज से मां महालक्ष्मी प्रकट होती हैं और भीषण युद्ध के बाद महिषासुर का वध करती हैं।

इसके बाद शुंभ और निशुंभ नामक असुर देवी को युद्ध की चुनौती देते हैं। उनके साथ धूम्रलोचन, चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे महाबलशाली असुर भी युद्ध में उतरते हैं। रक्तबीज की विशेषता यह थी कि उसके रक्त की प्रत्येक बूंद से नया असुर उत्पन्न हो जाता था, तब मां काली उसके रक्त को भूमि पर गिरने से पहले ही ग्रहण कर लेती हैं और अंततः उसका वध होता है। इसके बाद देवी शुंभ और निशुंभ का भी संहार कर देवताओं को पुनः उनका अधिकार दिलाती हैं।

दुर्गा सप्तशती का पाठ कब किया जाता है?

धार्मिक परंपरा के अनुसार दुर्गा सप्तशती का पाठ वर्ष भर किसी भी शुभ दिन किया जा सकता है, लेकिन कुछ अवसर विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने गए हैं। चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में इसका पाठ सर्वाधिक किया जाता है। इसके अतिरिक्त गुप्त नवरात्रि में तांत्रिक एवं शक्ति उपासना से जुड़े साधक भी दुर्गा सप्तशती का विशेष अनुष्ठान करते हैं। अष्टमी, नवमी, शुक्रवार तथा देवी के प्रमुख उत्सवों पर भी इसका पाठ किया जाता है। कई मंदिरों में प्रतिदिन नियमित रूप से दुर्गा सप्तशती का संपूर्ण या आंशिक पाठ करने की परंपरा आज भी चली आ रही है।



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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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