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Rahu Kaal: राहुकाल में शुभ कार्य क्यों नहीं किए जाते? जानें राहु से जुड़ी पौराणिक कथा और धार्मिक मान्यता

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Rahu Kaal: हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं में राहु का संबंध समुद्र मंथन की कथा से बताया गया है। समुद्र मंथन के बाद जब भगवान विष्णु ने देवताओं को अमृत बांटना शुरू किया, तब एक असुर देवताओं का रूप धारण करके उनके बीच बैठ गया। 

rahu kaal
Rahu Kaal: हिंदू धर्म में किसी भी शुभ काम को शुरू करने से पहले तिथि, नक्षत्र और शुभ मुहूर्त देखने की परंपरा रही है। इसी में राहुकाल का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। मान्यता है कि राहुकाल के समय नए और शुभ कार्यों की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। यही वजह है कि पूजा-पाठ, विवाह, गृह प्रवेश, यात्रा या किसी महत्वपूर्ण काम की शुरुआत करते समय राहुकाल से बचने की सलाह दी जाती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि राहुकाल को अशुभ क्यों माना जाता है? राहु से इसका क्या संबंध है और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी है? आइए जानते हैं।

क्या होता है राहुकाल?

ज्योतिष और हिंदू पंचांग की मान्यता के अनुसार दिन के समय को अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाता है। इनमें एक समय राहुकाल कहलाता है। सप्ताह के हर दिन राहुकाल की अवधि अलग होती है, लेकिन यह सामान्य तौर पर लगभग डेढ़ घंटे का माना जाता है। राहुकाल का निर्धारण सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच के दिनमान के आधार पर किया जाता है, इसलिए अलग-अलग स्थानों पर इसका समय एक जैसा नहीं होता। पंचांग में हर दिन राहुकाल का समय अलग से बताया जाता है। धार्मिक मान्यता में इसे ऐसा समय माना गया है, जिसमें नए शुभ कार्यों की शुरुआत करने से बचना चाहिए।

राहु कौन हैं?

हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं में राहु का संबंध समुद्र मंथन की कथा से बताया गया है। समुद्र मंथन के बाद जब भगवान विष्णु ने देवताओं को अमृत बांटना शुरू किया, तब एक असुर देवताओं का रूप धारण करके उनके बीच बैठ गया। उस असुर का नाम स्वरभानु था। उसने देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृत प्राप्त कर लिया। जैसे ही उसने अमृत ग्रहण किया, सूर्य देव और चंद्र देव को उसके बारे में पता चल गया। दोनों ने भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दी।

भगवान विष्णु ने किया सुदर्शन चक्र का प्रयोग

सूर्य और चंद्रमा की बात सुनकर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन अमृत पी लेने के कारण वह मर नहीं सका। पौराणिक मान्यता के अनुसार उसका सिर राहु और धड़ केतु कहलाया। इस तरह राहु और केतु का संबंध समुद्र मंथन और अमृत की इसी कथा से जोड़ा जाता है। ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह माना जाता है। हालांकि, इनके भौतिक रूप से ग्रह होने की बजाय इन्हें चंद्रमा की कक्षा और सूर्य के मार्ग से जुड़े गणितीय बिंदुओं के रूप में समझा जाता है, धार्मिक परंपरा में इन्हें विशेष ग्रह शक्ति के रूप में पूजा और माना जाता है।

राहुकाल का राहु से क्या संबंध है

धार्मिक मान्यता के अनुसार राहुकाल वह अवधि है, जिसमें राहु का प्रभाव अधिक माना जाता है, इसलिए इस समय किसी नए शुभ कार्य की शुरुआत करने से बचने की परंपरा है। मान्यता है कि राहु की प्रकृति भ्रम, अचानक आने वाली बाधाओं और अस्थिरता से जुड़ी मानी जाती है। ऐसे में शुभ काम की शुरुआत के लिए राहुकाल को उचित समय नहीं माना जाता। यही कारण है कि हिंदू परिवारों में महत्वपूर्ण कार्य शुरू करने से पहले राहुकाल जरूर देखा जाता है।

राहुकाल में शुभ कार्य क्यों नहीं होते

धार्मिक मान्यता के अनुसार राहुकाल के दौरान शुरू किए गए काम में बाधा आने या काम के अपेक्षित तरीके से पूरा न होने की आशंका मानी जाती है। इसी वजह से विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यापार शुरू करना, महत्वपूर्ण यात्रा करना या किसी नए कार्य की शुरुआत जैसे शुभ कामों के लिए इस अवधि से बचने की परंपरा है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि राहुकाल के दौरान हर काम करना वर्जित है। रोजमर्रा के जरूरी काम सामान्य रूप से किए जा सकते हैं। मुख्य रूप से नए और महत्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत के समय राहुकाल का ध्यान रखने की धार्मिक परंपरा है।

पूजा-पाठ पर क्या मान्यता है

राहुकाल में नए शुभ कार्य शुरू करने से बचने की मान्यता है, लेकिन इस समय भगवान की पूजा, मंत्र जाप और आराधना करने को लेकर अलग-अलग परंपराएं मिलती हैं। कई धार्मिक मान्यताओं में राहुकाल के दौरान राहु से जुड़े मंत्रों का जाप और भगवान शिव की पूजा करने का उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से राहु की शांति के लिए धार्मिक विधि से पूजा और मंत्र जाप करने की परंपरा भी बताई गई है।

राहु की पूजा क्यों की जाती है

राहु को लेकर जहां एक ओर राहुकाल में शुभ कार्यों से बचने की मान्यता है, वहीं दूसरी ओर राहु की पूजा और शांति के लिए धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। ज्योतिषीय और धार्मिक परंपराओं में राहु से जुड़े दोषों की शांति के लिए मंत्र जाप, दान और पूजा का विधान बताया गया है। इस तरह राहु को केवल अशुभ शक्ति के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उसकी शांति के लिए भी विशेष धार्मिक उपायों की परंपरा रही है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।) 

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