Navgraha Temple: हिंदू धर्म में ग्रहों को केवल आकाश में दिखाई देने वाले पिंड नहीं माना गया है, बल्कि इन्हें मनुष्य के जीवन और उसके कर्मों से जुड़े प्रभावों का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि कई मंदिरों में भगवान के साथ नवग्रहों की भी पूजा की जाती है। सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु को मिलाकर नवग्रह माने गए हैं। मान्यता है कि इन ग्रहों की पूजा करने से उनसे जुड़े अशुभ प्रभावों को शांत करने में सहायता मिलती है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नवग्रहों के लिए अलग मंदिर क्यों बनाए जाते हैं? नौ ग्रहों की पूजा की परंपरा आखिर कहां से आई और इनका धार्मिक महत्व क्या है? आइए जानते हैं।
क्या होते हैं नवग्रह
हिंदू धार्मिक परंपरा में नवग्रहों का विशेष स्थान बताया गया है। नवग्रह में सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु शामिल हैं। इनमें सूर्य और चंद्रमा को ग्रह के रूप में पूजा जाता है, जबकि राहु और केतु को छाया ग्रह माना गया है। ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में इन सभी ग्रहों का अलग-अलग महत्व बताया गया है। जन्म कुंडली में इनकी स्थिति के आधार पर व्यक्ति के जीवन में इनके शुभ और अशुभ प्रभावों की व्याख्या की जाती है। इसी धार्मिक मान्यता के आधार पर नवग्रहों की पूजा की परंपरा चली आ रही है।
नवग्रह मंदिर क्यों बनाए जाते हैं?
नवग्रह मंदिर बनाने के पीछे मुख्य धार्मिक मान्यता ग्रहों की शांति से जुड़ी हुई है। हिंदू धर्म में माना जाता है कि जब किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई ग्रह कमजोर या प्रतिकूल स्थिति में होता है, तो उसके जीवन में उससे संबंधित परेशानियां आ सकती हैं। ऐसे में उस ग्रह की पूजा, मंत्र जाप और दान आदि करने की परंपरा है। नवग्रह मंदिरों में सभी नौ ग्रहों की एक साथ पूजा की जाती है। श्रद्धालु यहां ग्रहों को प्रसन्न करने और उनके अशुभ प्रभाव को कम करने की कामना से पूजा-अर्चना करते हैं। कई स्थानों पर नवग्रहों के लिए अलग-अलग प्रतिमाएं स्थापित होती हैं और उनकी पूजा विशेष विधि से की जाती है।
सूर्य देव को क्यों माना जाता है प्रमुख
नवग्रहों में सूर्य को विशेष स्थान प्राप्त है। धार्मिक ग्रंथों में सूर्य को प्रकाश, ऊर्जा और जीवन का आधार माना गया है। सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता भी कहा जाता है क्योंकि उनका दर्शन प्रतिदिन किया जा सकता है। नवग्रह पूजा में सूर्य को सबसे प्रमुख ग्रहों में माना जाता है। रविवार के दिन सूर्य को जल अर्पित करने और उनकी उपासना करने की परंपरा भी प्रचलित है।
चंद्रमा का क्या महत्व है
चंद्रमा को मन और भावनाओं से जोड़ा गया है। धार्मिक मान्यताओं में चंद्रमा को शीतलता और मानसिक स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। सोमवार को भगवान शिव की पूजा के साथ चंद्रमा की उपासना का भी विशेष महत्व बताया गया है। नवग्रह पूजा में चंद्र देव की पूजा मानसिक शांति और चंद्र ग्रह से जुड़े दोषों की शांति के लिए की जाती है।
मंगल और बुध की पूजा
मंगल ग्रह को साहस, शक्ति और पराक्रम से संबंधित माना जाता है। मंगलवार के दिन मंगल देव की पूजा करने की परंपरा है। कुंडली में मंगल की स्थिति को लेकर भी ज्योतिष में विशेष विचार किया जाता है। वहीं बुध ग्रह को बुद्धि, वाणी और ज्ञान से जोड़ा जाता है। बुधवार के दिन बुध देव की पूजा की जाती है। नवग्रह मंदिरों में इन दोनों ग्रहों की भी विधि-विधान से पूजा होती है।
बृहस्पति और शुक्र की मान्यता
बृहस्पति को देवगुरु कहा गया है। धार्मिक परंपरा में उन्हें ज्ञान, धर्म और शुभता से संबंधित माना जाता है। गुरुवार के दिन बृहस्पति देव की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। शुक्र ग्रह को दैत्य गुरु शुक्राचार्य से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में शुक्र को सुख-सुविधा, वैभव और समृद्धि से संबंधित माना गया है। शुक्रवार को शुक्र ग्रह की पूजा की जाती है।
शनि देव की पूजा क्यों होती है
नवग्रहों में शनि देव की पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनि देव व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। इसलिए शनिवार के दिन शनि देव की पूजा, तेल अर्पित करने और जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा कई स्थानों पर देखने को मिलती है। नवग्रह मंदिरों में शनि देव की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। श्रद्धालु शनि से जुड़े कष्टों और ग्रह दोषों की शांति के लिए उनकी पूजा करते हैं।
राहु-केतु क्यों हैं नवग्रह में
राहु और केतु को अन्य ग्रहों से अलग छाया ग्रह माना गया है। पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय जब भगवान विष्णु मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत बांट रहे थे, तब एक असुर देवताओं के बीच बैठकर अमृत पीने लगा। सूर्य और चंद्रमा ने उसकी पहचान भगवान विष्णु को बता दी। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उस असुर का सिर धड़ से अलग कर दिया। अमृत का स्पर्श हो जाने के कारण उसका सिर राहु और धड़ केतु कहलाया। इसी पौराणिक कथा के कारण राहु और केतु को नवग्रहों में स्थान मिला।
नवग्रह पूजा की परंपरा
नवग्रह पूजा में आमतौर पर सभी नौ ग्रहों का आवाहन करके उनकी पूजा की जाती है। अलग-अलग ग्रहों के लिए अलग मंत्र, फूल, रंग, धातु और दान की वस्तुओं का उल्लेख धार्मिक परंपराओं में मिलता है। कई नवग्रह मंदिरों में ग्रहों की प्रतिमाओं को एक विशेष क्रम में स्थापित किया जाता है। श्रद्धालु मंदिर में जाकर नौ ग्रहों की परिक्रमा करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं। कुछ मंदिरों में ग्रहों की पूजा के लिए विशेष अनुष्ठान भी कराए जाते हैं।
ग्रह दोष की शांति से जुड़ी मान्यता
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार कुंडली में ग्रहों की स्थिति जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है। इसी आधार पर ग्रह दोष या ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव की शांति के लिए नवग्रह पूजा कराने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से नवग्रहों की पूजा करने से ग्रहों की शांति होती है। इसी विश्वास के कारण नवग्रह मंदिरों में विशेष अवसरों और ग्रहों से संबंधित अनुष्ठानों के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ देखी जाती है।
नवग्रह मंदिरों में कैसे होती है पूजा
नवग्रह मंदिरों में पूजा की विधि स्थान और परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। सामान्य रूप से स्नान और शुद्धिकरण के बाद नवग्रहों का पूजन किया जाता है। प्रत्येक ग्रह को उसके अनुसार फूल, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। कई स्थानों पर नवग्रह शांति के लिए विशेष मंत्रों का जाप और हवन भी कराया जाता है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना और धार्मिक विश्वास के अनुसार इन पूजा विधियों में शामिल होते हैं।
यह भी पढ़ें-
(
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)