Pitru Paksha 2026: महाभारत के सबसे बड़े दानवीरों में कर्ण का नाम लिया जाता है। कहा जाता है कि उनके द्वार से कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता था। सोना, धन, आभूषण ही नहीं, जरूरत पड़ने पर उन्होंने अपना कवच-कुंडल तक दान कर दिया था, लेकिन जब मृत्यु के बाद कर्ण स्वर्ग पहुंचे, तो उनके सामने एक ऐसी स्थिति आई, जिसने उन्हें हैरान कर दिया। उन्हें खाने के लिए भोजन नहीं मिल रहा था। आखिर ऐसा क्यों हुआ, जबकि कर्ण ने जीवनभर इतना दान किया था? क्या उनके दान में कोई कमी रह गई थी? आइए जानते हैं पितृपक्ष से जुड़ी कर्ण की यह पौराणिक कथा।
कर्ण को नहीं मिला भोजन
पौराणिक मान्यता के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद जब कर्ण की मृत्यु हुई और वे स्वर्ग पहुंचे, तो उन्हें वहां सभी सुख-सुविधाएं तो मिलीं, लेकिन भोजन नहीं मिला। कर्ण को इस बात पर आश्चर्य हुआ कि उन्होंने जीवनभर जरूरतमंदों को दान दिया, फिर उन्हें भोजन के लिए क्यों तरसना पड़ रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार, कर्ण ने देवताओं से इसका कारण पूछा, तब उन्हें बताया गया कि उन्होंने जीवन में बहुत अधिक मात्रा में सोना, धन और दूसरी वस्तुओं का दान किया था, लेकिन अपने पितरों के लिए श्राद्ध और अन्न का दान नहीं किया था।
सोने का दान किया, अन्न का नहीं
कर्ण की सबसे बड़ी पहचान उनके दानवीर स्वभाव से थी। महाभारत की परंपरा में भी कर्ण के उदार स्वभाव का वर्णन मिलता है। वे याचक को निराश नहीं करते थे और मांगी गई वस्तु देने के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन पितरों के निमित्त अन्न और जल का दान करने की परंपरा अलग मानी गई है। महाभारत में भोजन के दान को विशेष महत्व देते हुए कहा गया है कि अन्न सभी जीवों के जीवन का आधार है। कर्ण ने अपने जीवन में धन और सोने का दान तो खूब किया, लेकिन पितरों के लिए अन्न का दान नहीं किया था। इसी वजह से उन्हें स्वर्ग में भोजन प्राप्त नहीं हुआ।
कर्ण ने बताई अपनी वजह
कथा के अनुसार, कर्ण को जब अपने जीवन की इस कमी के बारे में पता चला तो उन्होंने इसका कारण बताया। उन्हें अपने वास्तविक जन्म और पिता के बारे में जीवन के बहुत बाद में जानकारी मिली थी, इसलिए वे अपने पितरों के लिए उस तरह के कर्म नहीं कर पाए, जैसे सामान्य तौर पर किए जाते हैं। यही कारण बताया जाता है कि मृत्यु के बाद उन्हें अपने इस कर्म का परिणाम भोजन की कमी के रूप में भुगतना पड़ा।
फिर मिला श्राद्ध करने का अवसर
कर्ण ने देवताओं से अपनी समस्या का समाधान पूछा, तब उन्हें पृथ्वी पर लौटकर अपने पितरों के लिए श्राद्ध और अन्न-जल का दान करने का अवसर दिया गया। मान्यता के अनुसार, कर्ण पृथ्वी पर वापस आए और उन्होंने अपने पितरों का श्राद्ध किया। उन्होंने अन्न, जल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान किया। इसके बाद ही उनकी भोजन से जुड़ी समस्या दूर हुई और उन्हें स्वर्ग में अन्न प्राप्त हुआ।
इसी से जुड़ी है पितृपक्ष की मान्यता
कर्ण की यह कथा पितृपक्ष से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथाओं में बताई जाती है। मान्यता है कि पितृपक्ष में व्यक्ति अपने दिवंगत पूर्वजों को याद करके उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और अन्न-जल का दान करता है। विष्णु पुराण में भी पितरों को संतुष्ट करने के लिए श्राद्ध में अन्न, घी, दूध आदि अर्पित करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इसी वजह से पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म में अन्न और जल को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किया गया श्राद्ध उनके प्रति कृतज्ञता और सम्मान का प्रतीक माना जाता है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)