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Madhyapradesh Jyotirlinga  : मध्यप्रदेश के इन 12 शिव मंदिरों में बसती है ज्योतिर्लिंग की आत्मा

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
सुप्रिया शर्मा
सार


Madhyapradesh Jyotirlinga  :    मध्य प्रदेश में 12 में से 2 ज्योतिर्लिग स्थित है- पहला महाकालेश्वर और दूसरा ओमकारेश्वर। लेकिन इन 2 के अलावा 10 ऐसे शिव मंदिर है जो किसी ज्योतिर्लिग से कम नहीं है। सभी की चमत्कारिक कहानियां हैं।

Shiv Mandir : 
Madhyapradesh Jyotirlinga  :    मध्य प्रदेश में 12 में से 2 ज्योतिर्लिग स्थित है- पहला महाकालेश्वर और दूसरा ओमकारेश्वर। लेकिन इन 2 के अलावा 10 ऐसे शिव मंदिर है जो किसी ज्योतिर्लिग से कम नहीं है। सभी की चमत्कारिक कहानियां हैं। यदि आप मध्यप्रदेश से हैं तो आपको इन शिव मंदिरों के दर्शन जरूर करना चाहिए क्योंकि यहां पर ज्योतिर्लिग की आत्मा बसती है या कहें कि साक्षात शिवजी विराजमान हैं।

 
1. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिग, उज्जैन:
1. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिग, उज्जैन: कहते हैं आकाश में आकाशलिंगे, पाताल में हाटकेश्वर और धरती पर महाकालेश्वर ही एकमात्र ज्योतिर्लिंग चेतन्य रूप से विद्यमान है। 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश के उज्जैन में क्षिप्रा के तट पर स्थित है। कालो के काल भगवान महाकाल उज्जैन में राजाधिराज के रूप में विराजित हैं।

 
2. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग,
2. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग, खंडवा: मध्यप्रदेश में ओंकारेश्वर नामक स्थान पर भी 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग, मां नर्मदा नदी के तट पर स्थित है। ओंकारेश्वर के पास ही कुछ ही किलोमीटर पर मंडलेश्वर और महेश्वर नामक प्राचीन स्थान है। कई ऋषियों और मुनियों की तपोस्थली ओमकार पर्वत पर स्थित यह बहुत ही प्राचीन स्थान है। प्रलय काल में भी यह डुबता नहीं है। 

 
3. पशुपतिनाथ मंदिर, मंदसौर:
3. पशुपतिनाथ मंदिर, मंदसौर: मध्य प्रदेश का पशुपतिनाथ मंदिर शिवना नदी के पास स्थित है, लेकिन इसकी पूरे भारत में प्रसिद्ध है। मंदसौर के मंदिर का शिवलिंग 19 जून 1940 को शिवना नदी से मिला था। कहते हैं कि इस शिवलिंग का निर्माण विक्रम संवत 575 ई. में सम्राट यशोधर्मन की हूणों पर विजय के आसपास का है। मंदसौर स्थित पशुपतिनाथ प्रतिमा अष्टमुखी है। मंदसौर स्थित प्रतिमा की ऊंचाई लगभग 7.25 फीट है। यहीं पर धर्म राजेश्वर मंदिर है जिसे एक सिंगल चट्टान काटकर बनाया गया है।

 
4. भोजेश्वर मंदिर, रायसेन
4. भोजेश्वर मंदिर, रायसेन: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किलोमीटर दूर भोजपुर रायसेन जिला में स्थित है अद्भुत शिवलिंग। भोजपुर की पहाड़ी पर स्थित यह शिवलिंग विशालकाय है। यह भोजपुर शिव मंदिर या भोजेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं। इस प्राचीन शिव मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज (1010 ई-1055 ई) द्वारा किया गया था। मंदिर 115 फीट (35 मी.) लंबे, 82 फीट (25 मी.) चौड़े तथा 13 फीट (4 मी.) ऊंचे चबूतरे पर खड़ा है। विश्व का सबसे बड़ा प्राचीन शिवलिंग माना जाता है। आधार सहित शिवलिंग की कुल ऊंचाई करीब 40 फीट (12 मी.) से अधिक है। शिवलिंग की लंबाई इसकी ऊंचाई 7.5 फीट (2.3 मी.) तथा व्यास 5.8 फीट (2 मी.) है। यह शिवलिंग एक 21.5 फीट (6.6 मी.) चौड़े वर्गाकार आधार (जलहरी) पर स्थापित है। मंदिर से प्रवेश के लिए पश्चिम दिशा में सीढ़ियां हैं। गर्भगृह के दरवाजों के दोनों ओर नदी देवी गंगा और यमुना की मूर्तियां लगी हुई हैं। 

 
5. मतंगेश्वर मंदिर
5. मतंगेश्वर मंदिर, खजुराहो: मध्य प्रदेश के खजुराहो में स्थित है मतंगेश्वर का मंदिर। कहते हैं कि यह मंदिर 9वीं सदी में निर्मित हुआ था परंतु यहां का शिवलिंग बहुत ही प्राचीन है। इस शिवलिंग को महाभारत काल का बताया जाता है। इस मंदिर का नाम मतंगेश्वर महान मतंग ऋषि के नाम पर पड़ा है। कहते हैं कि इस शिवलिंग का हर वर्ष आकार बढ़ जाता है। इस शिवलिंग की ऊंचाई लगभग ढाई मीटर और इसका व्यास एक मीटर बताया जाता है। खजुराहो में कंदरिया महादेव मंदिर भी है जो अपनी अद्भुत मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। 

 
6. सिद्धनाथ महादेव,
6. सिद्धनाथ महादेव, नेमावर: प्राचीन नगर नेमावर में पुण्य सलिला नर्मदा के किनारे स्थित प्राचीन सिद्धनाथ महादेव का मंदिर महाभारत काल का है।  किंवदंती है कि सिद्धनाथ मंदिर के शिवलिंग की स्थापना चार सिद्ध ऋषि सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार ने सतयुग में की थी। इसी कारण इस मंदिर का नाम सिद्धनाथ है। इसके ऊपरी तल पर ओंकारेश्वर और निचले तल पर महाकालेश्वर स्थित हैं। श्रद्धालुओं का ऐसा भी मानना है कि जब सिद्धेश्वर महादेव शिवलिंग पर जल अर्पण किया जाता है तब ॐ की प्रतिध्वनि उत्पन्न होती है। ऐसी मान्यता है कि इसके शिखर का निर्माण 3094 वर्ष ईसा पूर्व किया गया था। द्वापर युग में कौरवों द्वारा इस मंदिर को पूर्वमुखी बनाया गया था, जिसको पांडव पुत्र भीम ने अपने बाहुबल से पश्चिम मुखी कर दिया था। हिंदू और जैन पुराणों में इस स्थान का कई बार उल्लेख हुआ है। इसे सब पापों का नाश कर सिद्धिदाता तीर्थस्थल माना गया है।इसके अलावा मालवांचल में पांडव और कौरवों ने अनेक मंदिर बनाए थे जिनमें से एक है सेंधल नदी के किनारे बसा यह कर्णेश्वर महादेव का मंदिर। करनावद (कर्णावत) नगर के राजा कर्ण यहां बैठकर ग्रामवासियों को दान दिया करते थे इस कारण इस मंदिर का नाम कर्णेश्वर मंदिर पड़ा। ओंकारेश्वर में ममलेश्वर, उज्जैन में महाकालेश्वर, नेमावर में सिद्धेश्वर, बिजवाड़ में बिजेश्वर और करनावद में कर्णेश्वर मंदिर को एक दूसरे से जुड़ा हुआ मंदिर माना जाता है।

 
7. बड़ा महादेव,
7. बड़ा महादेव, पचमढ़ी: बड़ा महादेव का स्थान मध्यप्रदेश के पचमढ़ी में चौरागढ़ में स्थित है। पचमढ़ी शहर से लगभग 12 किलोमीटर दूर चौरागढ़ पहाड़ी स्थित है। महादेव मंदिर तक पहुंचने के लिए 3 किमी का पैदल चलना होता है। 1300 सीढ़ियों की चढ़ाई भी है। बड़ा महादेव मंदिर में एक गुफा है, जो बहुत ही खूबसूरत है और यह पहाड़ी पर बनी है। इस गुफा के अंदर आपको एक जलकुंड देखने मिलेगा। जब आप गुफा में जाते हैं तो आपको शंकर जी का शिवलिंग और उसके साथ ही साथ गणेश जी देखने मिलते हैं। गुफा के द्वार में नंदी भगवान की प्रतिमा बैठी हुई है जो पत्थर की बनी हुई है। लोग अपनी मन्नत के लिए यहां पर त्रिशूल अर्पित करते हैं। यहीं चौरागढ़ में जटा शंकर मंदिर इसे शिवजी का दूसरा घर माना जाता है। 

 
8. ककनमठ
8. ककनमठ, मंदिर मुरैना: एक प्रसिद्ध शिव मंदिर है, जो गुर्जर प्रतिहार शैली में बना है। स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर का निर्माण भूतों ने एक रात में किया था, लेकिन सुबह होने से पहले ही गांव की किसी महिला ने चक्की चलाई, जिससे आवाज सुनकर भूत भाग गए और मंदिर का काम अधूरा रह गया। हालांकि इस मंदिर को 11वीं शताब्दी में कच्छपघात राजवंश के राजा कीर्तिराज ने बनवाया था।

 
9. विराटेश्वर मंदिर,
9. विराटेश्वर मंदिर, शहडोल: विराटेश्वर मंदिर का निर्माण कलचुरी शासक, महाराजा युवराज देव प्रथम ने करवाया था। उन्होंने 950 ई. और 1050 ई. के बीच इसका निर्माण कराया था। यह मंदिर गोलकी मठ के आचार्य के लिए एक उपहार के रूप में बनाया गया था। करीब 70 फीट ऊंचे इस मंदिर की अद्भुत कलाकृतियां देख आप भी हतप्रभ रह जाएंगे। कलचुरी कालीन इस मंदिर को लोग विराट मंदिर के नाम से जानते हैं। यहां गर्भगृह में छोटे छोटे शिवलिंग हैं। इस शिवलिंग के दर्शन कर लेने मात्र से ही बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का लाभ मिल जाता है।
 
10. जटाशंकर मंदिर,

10. जटाशंकर मंदिर, बागली जिला देवास: घने जंगलों में पहाड़ी पर स्थित जटाशंकर तीर्थ अपने भीतर गहन शांति को समेटे हुए है। तीर्थ के परिक्षेत्र में  दाखिल होते ही व्यक्ति तनावरहित हो जाता है। पांच याज्ञिक वृक्षों के मध्य स्थित जटाशंकर तीर्थ अनादिकाल से ही अपने दिव्य स्वरूप, अलौकिकता, शांति और महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विख्यात रहा है। त्रेता युग में जटायु की तपोभूमि रहे इस स्थल पर अब तक कई संत-महात्माओं ने निवास किया और अपनी तपस्या से इस देवभूमि को पावन किया। तीर्थ की विशेषता भगवान जटाशंकर का अखंड जलाभिषेक करने वाली जलधारा हैँ, जिसका स्रोत पता लगाने में विशेषज्ञ भी असफल रहे हैं। जटाशंकर महादेव पर नीले व लाल रंग की धारियां हैं, इसलिए इसे नीललोहित शिवलिंग भी कहा जाता है। मंदिर की छत से सटी चट्टान पर बिल्प पत्र का वृक्ष है, इसलिए बिल्वपत्र और जल से भगवान का अखंड अभिषेक होता है।
 
   11. पातालेश्वर महादेव मंदिर,
  
11. पातालेश्वर महादेव मंदिर, अमरकंटक: अमरकंटक के कोटितीर्थ के मंदिरों के अलावा यहां से कुछ कदमों की दूरी पर कलचुरी राजाओं के द्वारा बनाए गए मंदिर हैं। यहां स्थित मंदिरों में पातालेश्वर महादेव मंदिर, शिव, विष्णु, जोहिला, कर्ण मंदिर और पंचमठ महत्वपूर्ण है। पातालेश्वर महादेव मंदिर में स्थित शिवलिंग की स्थापना शंकराचार्य ने की थी। इस मंदिर की विशेषता यह है कि शिवलिंग मुख्य भूमि से दस फीट नीचे स्थित है यहां श्रावण मास के एक सोमवार को नर्मदा का पानी पहुंचता है। कोटितीर्थ से आठ किमी उत्तर में स्थित है 'जलेश्वर महादेव'। यहां के मंदिरों को संवारने का कार्य कई शासकों ने किया जिनमें नाग, कल्चुरि, मराठा और बघेल वंश के शासक रहे हैं। इसके अलावा अमरकंटक में अमरेश्वर महादेव मंदिर और अमरकंटक से 8 किलोमीटर दूर शहडोल रोड पर श्री ज्वालेश्वर महादेव मंदिर स्थित शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान शिव ने की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने राक्षस त्रिपुरासुर को हराया था और उसके अवशेष यहां गिरे थे, जो बाद में शिवलिंग बन गया। इस मंदिर को महारुद्र मेरु भी कहा जाता है।

 
. महाकालेश्वर मंदिर,
12. महाकालेश्वर मंदिर, बिलावली: देवास के के पास बिलावली गांव में स्थित महाकालेश्वर शिव मंदिर का शिवलिंग प्रतिवर्ष एक तिल बढ़ता जा रहा है। मंदिर के आसपास रहने वाले और यहां नियम से दर्शन करने आने वाले लोगों का कहना है कि यहां का शिवलिंग न सिर्फ स्वयंभू है, बल्कि हर साल इसकी ऊंचाई लगातार बढ़ रही है, जो अपने आप में एक चमत्कार है। यहां का शिवलिंग भी उज्जैन के महाकालेश्वर शिवलिंग की तरह ही है।
 

- शैली प्रकाश

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