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Shardiya Navratri : शारदीय नवरात्रि में जरूर करें अर्गला स्तोत्र का पाठ, पूरी होगी मनोकामना!

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Shardiya Navratri : हिंदू धर्म में कई तरह की नवरात्रियों में शारदीय नवरात्रि का खास महत्व है इस दौरान भक्त देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हैं। यह त्योहार नौ दिनों तक बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है 

Shardiya Navratri : 

Shardiya Navratri : हिंदू धर्म में कई तरह की नवरात्रियों में शारदीय नवरात्रि का खास महत्व है इस दौरान भक्त देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हैं। यह त्योहार नौ दिनों तक बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है और दशहरा पर इसका समापन होता है। वैसे तो साल में चार नवरात्रियां होती हैं लेकिन आश्विन महीने में आने वाली शारदीय नवरात्रि को खास तरीके से मनाया जाता है। भक्त देवी को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखते हैं और कई तरह की पूजा-अर्चना करते हैं। ऐसी ही एक परंपरा है दुर्गा सप्तशती का पाठ करना, जो एक पवित्र ग्रंथ है और देवी दुर्गा के अलग-अलग रूपों की महिमा का वर्णन करता है। पाठ की शुरुआत देवी कवच से होती है, जिसके बाद अर्गला स्तोत्र का पाठ किया जाता है। अर्गला स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को कई लाभ मिलते हैं और उन पर देवी दुर्गा की कृपा बनी रहती है। आइए अर्गला स्तोत्र के पाठ से होने वाले फायदों के बारे में जानें।

शारदीय नवरात्रि के दौरान अर्गला स्तोत्र का पाठ क्यों महत्वपूर्ण है?

श्री दुर्गा सप्तशती में अर्गला स्तोत्र ठीक देवी कवच के बाद आता है। इसका महत्व इसके नाम से ही पता चलता है 'अर्गला' का अर्थ है वह जो सभी बाधाओं को दूर करे और आगे बढ़ने का रास्ता बनाए। नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान या किसी भी काम को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए इस पाठ को करना बहुत ज़रूरी माना जाता है। अर्गला स्तोत्र के मंत्रों के ज़रिए भक्त देवी भगवती से अपने दुश्मनों के नाश और जीवन में सफलता के लिए प्रार्थना करते हैं। जो लोग इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, उनकी इच्छाएं पूरी होती हैं और उन्हें अपने पापों से मुक्ति मिलती है।

अर्गला स्तोत्र क्या होता है?

ॐ नमश्चण्डिकायै

[ मार्कण्डेय उवाच ]

ॐ नमश्चण्डिकायै॥
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥1॥

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥2॥

मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥3॥

महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥4॥

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥5॥

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥6॥

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥7॥

अचिन्त्यरुपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥8॥

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥9॥

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि१॥10॥

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥11॥

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥12॥

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥13॥

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥14॥

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥15॥

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥16॥

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥17॥

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥18॥

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥19॥

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥20॥

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥21॥

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥22॥

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥23॥

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥24॥

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥25॥

अर्गला स्तोत्र का पाठ करने के फायदे

अर्गला स्तोत्र का बहुत महत्व है क्योंकि यह देवी दुर्गा का आशीर्वाद और सुरक्षा पाने का एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है। इस स्तोत्र में नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करने सौभाग्य लाने और भक्त को शक्ति, साहस और बुद्धि देने की क्षमता होती है।

अर्गला स्तोत्र का पाठ करना देवी शक्ति का सम्मान करने का भी एक तरीका माना जाता है जो शारदीय नवरात्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस स्तोत्र का पाठ करके भक्त माता दुर्गा के साथ गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं और दया सहानुभूति और निस्वार्थ भाव जैसे गुण अपनाते हैं।

इसके अलावा, अर्गला स्तोत्र बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी है और इसका पाठ भक्तों को अन्याय के खिलाफ खड़े होने और सही के लिए लड़ने के लिए प्रेरित करता है।

अगर आप भी शारदीय नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं तो इससे पहले अर्गला स्तोत्र का पाठ अवश्य करें।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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