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Sawan Purnima 2026: सावन पूर्णिमा पर नया जनेऊ धारण करना क्यों माना जाता है उत्तम

जीवांजलि धार्मिक डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

 Sawan Purnima 2026: सावन महीने की पूर्णिमा का खास महत्व है और इसे सावन पूर्णिमा या श्रावणी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इसी दिन रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है

 Sawan Purnima 2026
 Sawan Purnima 2026: सावन महीने की पूर्णिमा का खास महत्व है और इसे सावन पूर्णिमा या श्रावणी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इसी दिन रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है, जिससे यह तारीख और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इस दिन पवित्र स्नान,दान और तर्पण जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं, साथ ही कई अन्य रीति-रिवाजों का पालन भी किया जाता है। इसके अलावा इस दिन जनेऊ बदलने की परंपरा भी है व्यक्ति पुराना धागा उतारकर नया धागा धारण कर सकता है।

सावन पूर्णिमा का महत्व

इस साल सावन पूर्णिमा 28 अगस्त को पड़ रही है। इस दिन स्नान, दान और व्रत का संकल्प लेने जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा करने के साथ-साथ पूर्वजों के लिए तर्पण करना बहुत शुभ और फलदायी माना जाता है। सावन पूर्णिमा पर सत्यनारायण कथा का पाठ करने से *चंद्र दोष*  दूर होता है और घर व जीवन पर भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

जनेऊ बदलना

सावन पूर्णिमा इसलिए भी खास है क्योंकि इस दिन नया जनेऊ धारण करना बहुत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो लोग अपना पुराना जनेऊ बदलकर नया धारण करना चाहते हैं, उनके लिए यह दिन बहुत अच्छा है। नया धागा धारण करने से पहले स्नान, ध्यान और दान करना चाहिए। पुराना जनेऊ उतारने के बाद शरीर और मन दोनों को शुद्ध करना महत्वपूर्ण है। वाणी और विचारों की शुद्धता बनाए रखना जरूरी है  कठोर शब्दों या दूसरों के प्रति बुरी भावना से बचना और मन को शुद्ध रखना चाहिए। पूजा करने के बाद, मन में विचारों, कार्यों और वाणी की शुद्धता बनाए रखने का संकल्प लेते हुए नया जनेऊ धारण करना चाहिए।

त्रिदेव से संबंध

यज्ञोपवीत संस्कार हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक है। जनेऊ तीन गुणों का प्रतीक है सत,रज और तम। ध्यान दें कि सत, रज और तम को त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। जब भी पुराने पवित्र धागेको नए धागे से बदला जाता है तो यह प्रक्रिया तय रीति-रिवाजों के अनुसार की जानी चाहिए। उत्तर भारत में इस रस्म को 'श्रावणी उपाकर्म' के नाम से जाना जाता है जबकि दक्षिण भारत में इसे 'अवित्तम' कहा जाता है।

जनेऊ बदलने से जुड़े कुछ नियम यहाँ दिए गए हैं:


श्रावण पूर्णिमा:रक्षाबंधन का दिन जनेऊ बदलने के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है।

शुभ समय:आप किसी भी शुभ दिन और शुभ समय पर जनेऊ बदल सकते हैं।

धागा टूटने पर:अगर जनेऊ का कोई भी धागा टूट जाए, तो उसे बदल देना चाहिए।

छह महीने पुराना:अगर जनेऊ छह महीने से ज़्यादा पुराना हो जाए, तो उसे बदल देना चाहिए।

अशुद्ध होने पर: अगर जनेऊ किसी भी कारण से अशुद्ध हो जाए, तो उसे बदल देना चाहिए।

रात में न पहनें:रात में नया जनेऊ पहनना मना है, सिवाय तब के जब तुरंत बदलना ज़रूरी हो।

पुराने जनेऊ का क्या करें?

अगर यह गलती से टूट जाए या किसी कारण से अशुद्ध हो जाए, तो स्नान करने के बाद गायत्री मंत्र या जनेऊ* धारण करने के विशेष मंत्र का जाप करते हुए नया यज्ञोपवीत पहनना चाहिए और फिर पुराने *जनेऊ* को उल्टी दिशा में उतारकर हटा देना चाहिए।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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