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Swami Yogeshwaracharya Ji: युवा आध्यात्म से क्यों हो रहा हैं दूर? स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज ने बताया

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Indian Culture: युवाओं को धर्म से जोड़ने के लिए जरूरी है कि उन्हें डर या दबाव से नहीं, बल्कि तर्क, संस्कार और जीवन के वास्तविक अनुभवों के माध्यम से अध्यात्म से परिचित कराया जाए। 

Swami Yogeshwaracharya Ji Maharaj
Youth and Spirituality: आज के समय में देश का युवा धर्म और अध्यात्म से काफी दूर होता जा रहा है। बहुत से युवाओं को लगता है कि पूजा-पाठ, मंदिर जाना और धार्मिक गतिविधियां ऐसी चीजें हैं, जिन्हें उन पर जबरदस्ती थोपा जा रहा है। उन्हें लगता है कि धर्म केवल कुछ नियमों और परंपराओं तक सीमित है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि युवा पीढ़ी को धर्म और अध्यात्म से किस तरह जोड़ा जाए और उसे अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध कैसे कराया जाए।

स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज के अनुसार, युवाओं को धर्म से जोड़ने के लिए उन पर किसी बात को थोपने के बजाय उन्हें धर्म और अध्यात्म का वास्तविक अर्थ समझाना जरूरी है। जब युवा यह समझेगा कि अध्यात्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने का माध्यम है, तभी उसके भीतर इसके प्रति रुचि पैदा होगी।

माता-पिता की सेवा है पहला कर्तव्य

स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज बताते हैं कि मनुष्य के जीवन में उसके माता-पिता का विशेष स्थान है। जिन माता-पिता ने हमें जन्म दिया, हमारा पालन-पोषण किया और जीवन में आगे बढ़ने का अवसर दिया, उनकी सेवा करना हमारा पहला कर्तव्य होना चाहिए। धर्म केवल मंदिर जाने का नाम नहीं है। अपने माता-पिता का सम्मान करना, उनकी जरूरतों को समझना और उनकी सेवा करना भी सच्चे धर्म का ही हिस्सा है। यदि युवा इस भावना को अपने जीवन में उतार ले, तो उसके भीतर संस्कार और जिम्मेदारी दोनों विकसित होंगे।

मनुष्य जीवन परमात्मा का अनमोल उपहार

महाराज जी के अनुसार, मनुष्य का शरीर अत्यंत दुर्लभ है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में 84 लाख योनियों का उल्लेख मिलता है। जीव किसी भी योनि में जन्म ले सकता है, लेकिन मनुष्य जीवन उसे अपने कर्मों को समझने, सही और गलत में अंतर करने तथा परमात्मा को जानने का अवसर देता है। इसलिए हमें इस जीवन के लिए परमात्मा के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। प्रतिदिन कुछ क्षण भगवान के सामने बैठकर उन्हें धन्यवाद देना और अपने जीवन को सही दिशा देने की प्रार्थना करना चाहिए।

कर्म को ही पूजा मानें

स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज कहते हैं कि अध्यात्म का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाना है। मनुष्य जिस भी क्षेत्र में काम कर रहा है, उसे ईमानदारी और समर्पण के साथ अपना कर्म करना चाहिए। ऐसा कर्म जो व्यक्ति के साथ-साथ समाज और देश के हित में भी हो, वही सच्ची साधना है। यदि युवा अपने कार्य को निष्ठा से करे, माता-पिता की सेवा करे और परमात्मा के प्रति कृतज्ञ रहे, तो उसका जीवन अपने आप अध्यात्म की ओर बढ़ने लगेगा।

युवाओं को सही दिशा देता है अध्यात्म 

युवाओं को धर्म से जोड़ने के लिए जरूरी है कि उन्हें डर या दबाव से नहीं, बल्कि तर्क, संस्कार और जीवन के वास्तविक अनुभवों के माध्यम से अध्यात्म से परिचित कराया जाए। अध्यात्म युवा मन को शांति देता है, जिम्मेदारी का एहसास कराता है और जीवन के उद्देश्य को समझने में मदद करता है। युवा यदि अपने जीवन में सेवा, कर्तव्य, कृतज्ञता और अच्छे कर्मों को स्थान दे, तो यही उसके लिए सच्चे अध्यात्म की शुरुआत होगी।

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स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज
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