Religious Rituals: भगवान की भक्ति में केवल बाहरी विधि ही नहीं, बल्कि श्रद्धा, विनम्रता और क्षमा मांगने की भावना भी महत्वपूर्ण है। मनुष्य से पूजा-पाठ में भी कभी न कभी भूल हो सकती है।
Pavitrotsav Religious Significance: पवित्रोत्सव भगवान की पूजा से जुड़ा एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान है। इसका उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि पूरे वर्ष भगवान की आराधना में जाने-अनजाने हुई किसी कमी, भूल, अपराध या उपचार का प्रायश्चित करना भी माना गया है। स्वामी राघवाचार्य जी महाराज के अनुसार, पूरे वर्ष भक्त भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं, लेकिन पूजा के दौरान यदि किसी प्रकार की त्रुटि रह जाए या विधि-विधान में कोई कमी हो जाए तो उसकी क्षमा प्राप्त करने के लिए पवित्रोत्सव का विधान बताया गया है।
आगम शास्त्रों में पवित्रोत्सव के लिए विशेष समय का वर्णन मिलता है। आषाढ़ मास से लेकर कार्तिक मास के बीच आने वाले चार महीनों में किसी अनुकूल तिथि पर भगवान का पवित्रोत्सव किया जा सकता है। इस दौरान भगवान की विशेष आराधना की जाती है और कई प्रकार के धार्मिक विधान संपन्न किए जाते हैं। इसका मुख्य भाव भगवान को प्रसन्न करना और उनसे अपने जाने-अनजाने अपराधों के लिए क्षमा मांगना होता है।
पवित्रोत्सव के खास विधान
पवित्रोत्सव के दौरान देवताओं की आराधना, हवन, भगवान का अभिषेक और विशेष अर्चन किया जाता है। इस अवसर पर मंत्रों का पाठ और भगवान की स्तुति भी की जाती है। पूरे अनुष्ठान में श्रद्धा और विधि-विधान का विशेष महत्व माना जाता है। यह आयोजन कई दिनों तक चलता है और इसमें भगवान को विशेष रूप से तैयार की गई पवित्र मालाएं धारण कराई जाती हैं।
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पवित्र माला का क्या है महत्व
पवित्रोत्सव में सूत से बनी विशेष मालाओं का प्रयोग किया जाता है। इन मालाओं को हल्दी से अभिषेक करने के बाद उनकी विधिवत प्रतिष्ठा की जाती है। इसके बाद अनेक देवताओं का आवाहन और पूजन किया जाता है। कई अवसरों पर यह प्रक्रिया पांच दिनों तक चलती है। मंत्रों और स्तुतियों के साथ इन पवित्र मालाओं को भगवान को धारण कराया जाता है।
भगवान को क्यों पहनाई जाती है पवित्र माला
स्वामी राघवाचार्य जी महाराज के अनुसार, इन पवित्र मालाओं को लक्ष्मी स्वरूप और श्रीजी के स्वरूप के रूप में माना जाता है। जब भगवान इन पवित्र मालाओं को धारण करते हैं तो इसे भगवान के मुखोल्लास और प्रसन्नता का प्रतीक माना जाता है। भक्त की भावना होती है कि भगवान प्रसन्न होकर पूरे वर्ष में हुई पूजा संबंधी भूलों और कमियों को क्षमा करें।
क्षमा मांगने का अवसर है पवित्रोत्सव
पवित्रोत्सव हमें यह संदेश देता है कि भगवान की भक्ति में केवल बाहरी विधि ही नहीं, बल्कि श्रद्धा, विनम्रता और क्षमा मांगने की भावना भी महत्वपूर्ण है। मनुष्य से पूजा-पाठ में भी कभी न कभी भूल हो सकती है। ऐसे में पवित्रोत्सव अपने भीतर झांकने और भगवान के सामने अपनी भूल स्वीकार करके क्षमा मांगने का अवसर प्रदान करता है। भगवान को पवित्र माला अर्पित करके भक्त उनसे प्रसन्न होने और अपने सभी अपराधों को क्षमा करने की प्रार्थना करता है। यही पवित्र माला ‘पवित्रा’ कहलाती है और इसी के कारण इस विशेष अनुष्ठान को पवित्रोत्सव कहा जाता है।