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Swami Avdheshanand Giri Ji Maharaj: राजा दशरथ की क्या थी दुर्बलता? स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज ने बताया

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Raja Dashrath Story: राजा दशरथ की कमजोरी उनका पराक्रम नहीं, बल्कि उनका अत्यंत कोमल और करुणामय हृदय था। वे दूसरों के आंसू नहीं देख सकते थे। यही संवेदनशीलता एक ओर उनके महान व्यक्तित्व की पहचान थी।
 

Swami Avdheshanand Giri Ji Maharaj
Hindu Dharmik Katha: स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज बताते हैं कि जो व्यक्ति वास्तव में सत्पुरुष और महात्मा होता है, वह किसी दूसरे के आंसू और दुख को देखकर सहज नहीं रह सकता। उसका हृदय इतना करुणामय होता है कि किसी की पीड़ा उसे भीतर तक व्याकुल कर देती है। पराक्रमी और महान व्यक्ति भले ही युद्ध के मैदान में अडिग दिखाई दें, लेकिन किसी दुखी व्यक्ति के आंसू उनके हृदय को पिघला देते हैं।

राजा दशरथ केवल अयोध्या के राजा ही नहीं, बल्कि अत्यंत पराक्रमी और सम्मानित पुरुष थे। उनके शौर्य और सामर्थ्य का सम्मान देवता भी करते थे। जब राजा दशरथ स्वर्ग जाते थे, तब देवराज इंद्र भी उनका आदर करते थे। कहा जाता है कि इंद्र उन्हें अपने आसन पर बैठाते थे और स्वयं उनका सम्मान करते थे। यम, वरुण, कुबेर जैसे देवता भी उनके पराक्रम से परिचित थे। इससे समझा जा सकता है कि राजा दशरथ साधारण राजा नहीं थे, बल्कि महान सामर्थ्य और प्रतिष्ठा वाले पुरुष थे।

एक कमजोरी ने बदल दिया सब 

इतने पराक्रमी राजा की एक ऐसी दुर्बलता थी, जिसका लाभ लेकर कैकेयी ने उनसे दो वरदान मांग लिए। उनकी सबसे बड़ी कमजोरी थी कि वे अपने प्रियजनों के आंसू नहीं देख सकते थे। किसी अपने को दुखी देखकर राजा दशरथ अत्यंत व्याकुल हो जाते थे। यही भावनात्मक कमजोरी आगे चलकर उनके जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा का कारण बनी।

कैकेयी ने उठाया इस कमजोरी का लाभ

जब कैकेयी रूठकर कोपभवन में चली गईं और दुखी होकर बैठ गईं, तब राजा दशरथ उन्हें इस अवस्था में देखकर बहुत परेशान हो गए। उन्होंने बार-बार पूछा कि आखिर किसने उनका अपमान किया है और कौन-सी बात उन्हें इतनी पीड़ा दे रही है। राजा दशरथ ने उन्हें विश्वास दिलाया कि यदि किसी ने उनके साथ अन्याय किया है तो वह उसे दंड देंगे।

दो वरदानों ने बदल दी अयोध्या की कहानी

कैकेयी ने राजा दशरथ से उनके दिए हुए दो वरदान मांग लिए। पहला वरदान था कि राम का राज्याभिषेक रोक दिया जाए और दूसरा था कि राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया जाए तथा भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए। राजा दशरथ यह सुनकर भीतर से टूट गए। जिस राम से उन्हें सबसे अधिक प्रेम था, उसी राम से दूर होने की कल्पना ने उन्हें असहनीय पीड़ा दी।

करुणा बनी राजा दशरथ की परीक्षा

राजा दशरथ की कमजोरी उनका पराक्रम नहीं, बल्कि उनका अत्यंत कोमल और करुणामय हृदय था। वे दूसरों के आंसू नहीं देख सकते थे। यही संवेदनशीलता एक ओर उनके महान व्यक्तित्व की पहचान थी, वहीं दूसरी ओर इसी का लाभ उठाकर कैकेयी ने उनसे ऐसे वरदान मांग लिए, जिन्होंने रामायण की पूरी कथा की दिशा बदल दी।

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स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज
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