विज्ञापन
Home  dharm  saint stories  swami ishan mahesh ji maharaj told is fasting a part of devotion in life

Swami Ishan Mahesh Ji Maharaj: क्या भक्ति का हिस्सा है उपवास? जानें क्या कहते हैं स्वामी ईशान महेश जी महाराज

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी ईशान महेश जी महाराज
सार

Self-Discipline: उपवास और भक्ति केवल धार्मिक नियम नहीं हैं, बल्कि ये आत्मिक और मानसिक विकास के साधन हैं। इनका उद्देश्य मन को सरल, शांत और शुद्ध बनाना है।
 

Swami Ishan Mahesh Ji Maharaj
Spiritual Growth in Life: भक्ति में उपवास का स्थान और इसका वास्तविक उद्देश्य क्या है, इसे समझना बहुत जरूरी है। स्वामी ईशान महेश जी महाराज के विचारों के आधार पर इसे सरल भाषा में इस प्रकार समझा जा सकता है कि उपवास, योग, जप, हवन और अन्य धार्मिक अभ्यास केवल बाहरी क्रियाएं नहीं हैं, बल्कि ये मन को शुद्ध और सरल बनाने के साधन हैं। उपवास को अक्सर लोग केवल भोजन न करने की प्रक्रिया मान लेते हैं, लेकिन इसका गहरा अर्थ है अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करना। 

उपवास का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं है, बल्कि शरीर और मन को एक अनुशासन में लाना है। जब कोई व्यक्ति उपवास करता है, तो वह अपने भीतर संयम विकसित करता है और इच्छाओं पर नियंत्रण करना सीखता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे मन को स्थिर और शांत बनाने में मदद करती है।

भक्ति और उपवास का संबंध

भक्ति का अर्थ केवल पूजा-पाठ करना नहीं है, बल्कि मन को ईश्वर के प्रति समर्पित करना है। उपवास भक्ति का एक साधन हो सकता है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है कि हर भक्ति करने वाला व्यक्ति उपवास करे। जब व्यक्ति को उपवास, जप या योग करने से संतुष्टि मिलती है और मन में प्रसन्नता अनुभव होती है, तब वह इन्हें करता रहता है। यह एक तरह की मानसिक यात्रा होती है जिसमें व्यक्ति धीरे-धीरे अपने अंदर की अशांति को शांत करता है।

मन को सरल बनाने की प्रक्रिया

स्वामी जी के अनुसार, ये सभी धार्मिक और आध्यात्मिक अभ्यास जैसे जप, योग, हवन और उपवास मन को सरल बनाने के लिए हैं। मन में जो कुटिलता, चंचलता और अशांति होती है, उसे दूर करने के लिए ये साधन अपनाए जाते हैं। जब व्यक्ति राम नाम का जप करता है या ध्यान करता है, तो उसका मूल उद्देश्य ईश्वर को पाना हो सकता है, लेकिन इसके साथ-साथ उसका मन भी शुद्ध होता जाता है। यह प्रक्रिया ऐसे ही है जैसे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम किया जाता है।

व्यायाम का उदाहरण

जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दौड़ना, कसरत करना और मेहनत करना पड़ता है, उसी प्रकार मन को स्वस्थ रखने के लिए आध्यात्मिक अभ्यास करने पड़ते हैं। यदि कोई व्यक्ति लगातार व्यायाम करता है, तो उसका शरीर मजबूत और संतुलित हो जाता है। ठीक उसी तरह जब व्यक्ति नियमित रूप से जप, ध्यान और उपवास करता है, तो उसका मन भी धीरे-धीरे सरल और निर्मल हो जाता है। यह एक प्रकार का मानसिक अभ्यास है जो मन की चर्बी यानी नकारात्मक विचारों को कम करता है।

संतोष और अगले स्तर की यात्रा

जब व्यक्ति इन सभी साधनों से संतुष्ट हो जाता है, तब एक समय ऐसा आता है जब उसे इन बाहरी अभ्यासों की आवश्यकता कम महसूस होने लगती है। यह स्थिति इस बात का संकेत होती है कि उसका एक चरण पूरा हो चुका है और अब वह आगे के आध्यात्मिक स्तर की ओर बढ़ सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि अभ्यास बंद कर देना चाहिए, बल्कि यह समझना चाहिए कि अब मन अधिक स्थिर हो गया है और उसे कम सहारे की जरूरत है।

आंतरिक शांति का अनुभव 

उपवास और भक्ति केवल धार्मिक नियम नहीं हैं, बल्कि ये आत्मिक और मानसिक विकास के साधन हैं। इनका उद्देश्य मन को सरल, शांत और शुद्ध बनाना है। जब मन कुटिलता से मुक्त होकर सहज हो जाता है, तब व्यक्ति वास्तविक संतोष और आंतरिक शांति का अनुभव करता है। यही इन सभी अभ्यासों का अंतिम लक्ष्य है, जो धीरे-धीरे साधक को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।

ये भी पढ़ें -  भगवान जगन्नाथ को 15 दिन किन चीजों का लगेगा भोग, जानें नियम और परंपरा

ये भी देखें

Devi Maheshwari Ji
कथावाचक देवी माहेश्वरी जी (श्रीजी)
01 July 2026
Rambhadracharya Ji Maharaj
श्री रामभद्राचार्य जी महाराज
01 July 2026
Swami Yogeshwar Acharya Ji Maharaj
स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज
30 June 2026
Swami Chinmayanand Bapu
स्वामी चिन्मयानंद बापू
30 June 2026
Sadhvi Krishnapriya Ji
कथावाचक साध्वी कृष्णप्रिया जी
30 June 2026

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel