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Swami Chinmayanand Bapu: भगवान शिव शरीर पर क्यों लगाते हैं भस्म, स्वामी चिन्मयानंद बापू ने बताई सच्चाई

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी चिन्मयानंद बापू
सार

Shiva Purana: भगवान शिव तुरंत उस चिता के पास पहुंचे जहां उस व्यक्ति का अंतिम संस्कार हुआ था। तब तक उसका शरीर पूरी तरह भस्म बन चुका था। भगवान शिव ने श्रद्धा से उस चिता की भस्म अपने हाथों में उठाई और उसे अपने पूरे शरीर पर लगा लिया।
 

Swami Chinmayanand Bapu
Bhasma Ka Mahatva: भगवान शिव को भस्म अत्यंत प्रिय है। उनके पूरे शरीर पर लगी भस्म केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि संसार के प्रत्येक जीव के लिए एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है। यह हमें याद दिलाती है कि यह शरीर नश्वर है और एक दिन मिट्टी में मिल जाना है। चाहे मनुष्य कितना भी सुंदर हो, कितना भी धनवान हो या अपने शरीर का कितना भी श्रृंगार कर ले, अंत में उसका शरीर चिता की भस्म बन जाता है। इसलिए मनुष्य को शरीर के अभिमान में नहीं, बल्कि ईश्वर की भक्ति में जीवन बिताना चाहिए।

स्वामी चिन्मयानंद बापू कहते हैं कि मनुष्य अपने शरीर को सजाने-संवारने में जीवनभर लगा रहता है। कोई महंगे वस्त्र पहनता है, कोई आभूषणों से स्वयं को सजाता है और कोई सुंदर दिखने के लिए अनेक उपाय करता है। लेकिन सत्य यही है कि यह शरीर हमेशा रहने वाला नहीं है। एक दिन यह पंचतत्व में विलीन होकर भस्म बन जाएगा। संतों ने भी कहा है कि यह शरीर मिट्टी से बना है और अंत में मिट्टी में ही मिल जाएगा। मृत्यु के बाद न धन साथ जाता है, न पद, न प्रतिष्ठा और न ही कोई संबंध। अंत में केवल भगवान का नाम और मनुष्य के अच्छे कर्म ही उसके साथ रहते हैं।

मृत्यु के बाद सब समान 

संसार में कोई गरीब है तो कोई अमीर, कोई राजा है तो कोई साधारण व्यक्ति। लेकिन मृत्यु सभी को समान बना देती है। चिता की अग्नि में जलने के बाद सभी की पहचान समाप्त हो जाती है। इसलिए किसी को अपने धन, शक्ति या सौंदर्य का अहंकार नहीं करना चाहिए। भगवान शिव की भस्म हमें यही सिखाती है कि जीवन में विनम्रता, सेवा और भक्ति ही सबसे बड़ा धन है।

'राम नाम सत्य है' की कथा

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि एक शवयात्रा जा रही है। शव को कंधे पर उठाए लोग बार-बार बोल रहे थे, "राम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है।" यह सुनकर भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सोचा कि ये लोग कितने ज्ञानी हैं, जिन्हें यह ज्ञान है कि इस संसार में केवल भगवान का नाम ही सत्य है और बाकी सब नश्वर है। इस भावना से वे भी उस शवयात्रा के पीछे-पीछे श्मशान तक पहुंच गए।

शिवजी को मिला जीवन का एक और संदेश

श्मशान में अंतिम संस्कार पूरा होने के बाद लोग वापस लौटने लगे। भगवान शिव भी उनके साथ चलने लगे। उन्होंने देखा कि अब कोई भी "राम नाम सत्य है" नहीं बोल रहा था। तब भगवान शिव ने लोगों से पूछा, "तुम लोग अब वह वचन क्यों नहीं बोल रहे, जो शवयात्रा के समय बोल रहे थे?" लोगों ने सहज भाव से उत्तर दिया, "महाराज, वह तो केवल शवयात्रा के समय बोलना पड़ता है। अब उसकी आवश्यकता नहीं है।" यह सुनकर भगवान शिव को आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि उस मृत व्यक्ति के कारण लोगों के मुख से भगवान श्रीराम का नाम निकल रहा था, तो वह व्यक्ति कितना पुण्यवान रहा होगा।

भगवान शिव ने क्यों लगाई चिता की भस्म?

भगवान शिव तुरंत उस चिता के पास पहुंचे जहां उस व्यक्ति का अंतिम संस्कार हुआ था। तब तक उसका शरीर पूरी तरह भस्म बन चुका था। भगवान शिव ने श्रद्धा से उस चिता की भस्म अपने हाथों में उठाई और उसे अपने पूरे शरीर पर लगा लिया। उन्होंने यह संदेश दिया कि जो भस्म मनुष्य के शरीर का अंतिम रूप है, वही हमें जीवन का सबसे बड़ा सत्य भी सिखाती है। यह भस्म हमें अहंकार छोड़कर भगवान का स्मरण करने, अच्छे कर्म करने और जीवन की नश्वरता को समझने की प्रेरणा देती है। इसी कारण भगवान शिव को चिता की भस्म अत्यंत प्रिय मानी जाती है। उनके शरीर पर लगी भस्म हमें हर क्षण यह स्मरण कराती है कि संसार की सभी वस्तुएं नश्वर हैं, जबकि केवल परमात्मा का नाम और सत्य ही शाश्वत है।

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