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Rambhadracharya Ji Maharaj: भगवान के चरणामृत में हैं 99 करोड़ तीर्थ, क्या कहते हैं रामभद्राचार्य जी महाराज?

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
श्री रामभद्राचार्य जी महाराज
सार

Charanamrit Importance: भगवान और गुरु के चरणामृत का सनातन परंपरा में अत्यंत ऊंचा स्थान है। शास्त्रों के अनुसार इसमें असंख्य तीर्थों का पुण्य समाहित माना गया है। 
 

Rambhadracharya Ji Maharaj
Charanamrit Ka Mahatva: सनातन धर्म में चरणामृत को अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी माना गया है। मंदिरों में भगवान के दर्शन के बाद श्रद्धालुओं को चरणामृत ग्रहण कराया जाता है। मान्यता है कि यह केवल जल नहीं होता, बल्कि भगवान की कृपा और आशीर्वाद का स्वरूप होता है। संत और आचार्य भी इसके महत्व का वर्णन करते आए हैं। जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज भी अपने प्रवचनों में बताते हैं कि भगवान के चरणामृत में 99 करोड़ तीर्थों का वास माना गया है। इसलिए श्रद्धा और विश्वास के साथ चरणामृत ग्रहण करने से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।

रामभद्राचार्य जी महाराज के अनुसार शास्त्रों में यह वर्णन मिलता है कि भगवान के चरणामृत में असंख्य तीर्थों का निवास होता है। इसी भाव को समझाते हुए वे कहते हैं कि भगवान के चरणों का स्पर्श जिस जल को प्राप्त होता है, वह साधारण नहीं रह जाता, बल्कि वह सभी पवित्र तीर्थों के समान पुण्य देने वाला बन जाता है। इसलिए मंदिर में मिलने वाले चरणामृत को सदैव श्रद्धा और विनम्रता के साथ ग्रहण करना चाहिए। उनका कहना है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से चरणामृत ग्रहण करता है, उसे आध्यात्मिक शांति, मन की पवित्रता और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

शास्त्रों में भी मिलता है उल्लेख

रामभद्राचार्य जी महाराज शास्त्रों का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि सभी तीर्थों का महत्व अंततः भगवान और गुरु के चरणों में समाहित माना गया है। वे संस्कृत का प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत करते हैं...

"पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि तिष्ठन्ति सागरे।
सागरे यानि तीर्थानि गुरुपादोदके स्थितानि।।"


इसका सरल अर्थ है कि पृथ्वी पर जितने भी पवित्र तीर्थ हैं, वे समुद्र में समाहित हैं और समुद्र में जितने तीर्थ हैं, उनका पुण्य गुरु के चरणोदक अर्थात चरणामृत में विद्यमान माना गया है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में गुरु और भगवान दोनों के चरणामृत का विशेष महत्व बताया गया है।

गुरु और गोविंद के चरणामृत का महत्व

रामभद्राचार्य जी महाराज कहते हैं कि शास्त्रों ने केवल भगवान ही नहीं, बल्कि गुरु के चरणामृत को भी आदरपूर्वक ग्रहण करने का विधान किया है। गुरु वह हैं जो अज्ञान के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देते हैं। इसलिए गुरु का स्थान भी अत्यंत ऊंचा माना गया है। कबीरदास जी का प्रसिद्ध दोहा भी इसी भावना को प्रकट करता है कि गुरु और गोविंद दोनों सामने खड़े हों तो पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ही भगवान तक पहुंचने का मार्ग दिखाते हैं। महाराज जी बताते हैं कि भगवान स्वयं गुरु स्वरूप हैं और सच्चे गुरु भगवान के प्रतिनिधि होते हैं। इसलिए दोनों के चरणों का सम्मान करना और उनके चरणामृत को श्रद्धा से ग्रहण करना आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम माना गया है।

श्रद्धा से मिलता है विशेष लाभ

रामभद्राचार्य जी महाराज के अनुसार चरणामृत का प्रभाव केवल धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के मन में भक्ति, विनम्रता और सकारात्मक भाव पैदा करता है। जब कोई भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ चरणामृत ग्रहण करता है, तो उसके भीतर भगवान के प्रति समर्पण की भावना मजबूत होती है। इससे मन को शांति मिलती है और जीवन में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। वे कहते हैं कि चरणामृत को कभी साधारण जल नहीं समझना चाहिए। यह भगवान की कृपा का प्रतीक है और इसे सम्मानपूर्वक ग्रहण करना चाहिए। श्रद्धा के बिना किसी भी धार्मिक कर्म का पूरा फल नहीं मिलता, इसलिए चरणामृत ग्रहण करते समय मन में भक्ति और विश्वास होना आवश्यक है।

असंख्य तीर्थों का पुण्य समाहित

रामभद्राचार्य जी महाराज का संदेश है कि भगवान और गुरु के चरणामृत का सनातन परंपरा में अत्यंत ऊंचा स्थान है। शास्त्रों के अनुसार इसमें असंख्य तीर्थों का पुण्य समाहित माना गया है। इसलिए प्रत्येक श्रद्धालु को मंदिर में मिलने वाले चरणामृत का सम्मान करना चाहिए और उसे पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास के साथ ग्रहण करना चाहिए। ऐसा करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है, मन पवित्र होता है और आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

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