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Swami Avdheshanand Giri Ji Maharaj: संत-सत्पुरुष व गुरु से कैसे मिलना चाहिए? स्वामी अवधेशानंद गिरी जी ने बताया

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Spiritual Master: संत-सत्पुरुष या गुरु से मिलने का सही तरीका यही है कि हम अपने साथ माया का अहंकार, पद का गर्व और सांसारिक उपलब्धियों का प्रदर्शन लेकर न जाएं। 

Swami Avdheshanand Giri Ji Maharaj
Saint and Guru Darshan: संत-सत्पुरुष अथवा गुरु से मिलना केवल उनके दर्शन करने या उनके सामने उपस्थित हो जाने का नाम नहीं है। संत का मिलन एक आध्यात्मिक अवसर है, जो मनुष्य के जीवन को भीतर से बदल सकता है। स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज ने बताया कि जो जो पग आगे बढ़ें, कोटिन यज्ञ समान। संत मिलन को चालिए, तज माया अभिमान। अर्थात संत की ओर बढ़ाया गया प्रत्येक कदम अनेक यज्ञों के समान पुण्यदायी है, लेकिन संत के पास जाते समय मनुष्य को अपनी माया और अभिमान पीछे छोड़ देना चाहिए।

स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज कहते हैं कि जब हम किसी संत या गुरु के पास जाएं तो अपने पद, प्रतिष्ठा, धन, संग्रह, प्रसिद्धि और यश का विचार मन में लेकर नहीं जाना चाहिए। संसार में हमारे पास चाहे कितना भी धन हो, समाज में कितनी भी प्रतिष्ठा हो या लोग हमारी कितनी भी प्रशंसा करते हों, संत के सामने इन सबका कोई महत्व नहीं है। संत के पास जाने का उद्देश्य अपने सांसारिक वैभव का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि अपने भीतर की कमियों को दूर करना होना चाहिए। इसलिए संत के दर्शन के समय कुछ समय के लिए अपनी सांसारिक पहचान को भूलकर एक साधारण और विनम्र व्यक्ति बनकर जाना चाहिए।

अभिमान को छोड़ना सबसे आवश्यक

संत से मिलने के लिए सबसे पहले अपने अहंकार को बाहर छोड़ना चाहिए। मन में यह भाव नहीं होना चाहिए कि मैं बड़ा व्यक्ति हूं, मेरे पास बहुत धन है या समाज में मेरा बहुत सम्मान है। संत के सामने हर व्यक्ति समान है। वहां केवल विनम्रता और श्रद्धा का मूल्य है। हमारा पहनावा, आभूषण या बाहरी रूप ऐसा हो सकता है जैसा सामान्य जीवन में हम रखते हैं, लेकिन उसमें दिखावा और महानता का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। संत के सामने सरलता ही सबसे सुंदर आभूषण है।

भेंट में भी दिखावा नहीं, श्रद्धा हो

यदि हम गुरु या संत के लिए कोई वस्तु लेकर जा रहे हैं तो उसका भी प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। यह बताने की आवश्यकता नहीं कि हमने उनके लिए क्या-क्या लाया है या कितनी महंगी वस्तु अर्पित कर रहे हैं। जो देना है, उसे चुपचाप, श्रद्धा और विनम्रता से अर्पित करना चाहिए। भेंट की कीमत नहीं, उसके पीछे छिपी भावना महत्वपूर्ण होती है। एक छोटा-सा पुष्प भी सच्चे प्रेम से अर्पित किया जाए तो वह बहुत मूल्यवान हो जाता है।

आत्मसमर्पण ही है सबसे बड़ी साधना

संत के चरणों में जाकर सबसे बड़ा अर्पण अपने अहंकार और अपने मन का करना चाहिए। केवल वस्तुएं अर्पित करने से समर्पण पूरा नहीं होता। वास्तविक समर्पण तब होता है, जब मनुष्य अपने मन, बुद्धि, कर्म और जीवन को ईश्वर और गुरु के चरणों में समर्पित कर देता है। “सर्वोत्तम साधना क्या है?” यदि यह प्रश्न पूछा जाए तो उसका उत्तर आत्मसमर्पण है। इससे बड़ी कोई साधना नहीं मानी गई है।

श्रद्धा और विनम्रता से करें प्रणाम

संत के सामने पुष्प, धूप, दीप, अक्षत आदि अर्पित करते समय मन में श्रद्धा होनी चाहिए। शीश झुकाते हुए यह भावना हो कि हे प्रभु, मेरे भीतर जो कुछ अच्छा है वह आपकी कृपा है और जो कुछ कमी है उसे दूर करने की शक्ति भी आप ही प्रदान करें। संत के चरणों में जाकर हमें कुछ पाने की अपेक्षा से अधिक स्वयं को बदलने की भावना रखनी चाहिए।

संत के पास खाली मन लेकर जाएं

संत-सत्पुरुष या गुरु से मिलने का सही तरीका यही है कि हम अपने साथ माया का अहंकार, पद का गर्व और सांसारिक उपलब्धियों का प्रदर्शन लेकर न जाएं। अपने भीतर श्रद्धा, विनम्रता, प्रेम और समर्पण लेकर जाएं। जब मनुष्य स्वयं को छोटा करके संत के सामने उपस्थित होता है, तभी संत की कृपा और उनकी वाणी को ग्रहण करने की पात्रता पैदा होती है। वास्तव में संत से मिलना बाहरी यात्रा नहीं, बल्कि अपने अहंकार से भीतर की यात्रा करने का अवसर है।

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