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Pandit Pradeep Mishra Ji: सृष्टि और दृष्टि के प्रेम में क्या है अंतर? पंडित प्रदीप मिश्रा जी ने बताया महत्व

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज
सार

Life Lessons: सृष्टि में प्रेम मिलना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि हमारी दृष्टि प्रेम से भर जाए। सृष्टि का प्रेम परिस्थितियों के साथ बदल सकता है, लेकिन प्रेममयी दृष्टि हमें हर परिस्थिति में अच्छाई देखने की शक्ति देती है। 
 

Pandit Pradeep Mishra Ji Maharaj
Love in Life: प्रेम जीवन का सबसे सुंदर भाव है। प्रेम के कारण ही मनुष्य के भीतर करुणा, दया, अपनापन और सकारात्मकता पैदा होती है। पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज प्रेम के इसी गहरे भाव को समझाते हुए बताते हैं कि केवल सृष्टि में प्रेम होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि हमारी दृष्टि में भी प्रेम होना आवश्यक है। सृष्टि में प्रेम और दृष्टि में प्रेम, दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। जब हम सृष्टि में प्रेम खोजते हैं तो हमारा प्रेम परिस्थितियों और लोगों के व्यवहार पर निर्भर हो जाता है, लेकिन जब हमारी दृष्टि ही प्रेम से भर जाती है तो हमें पूरी सृष्टि प्रेममयी दिखाई देने लगती है।

पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज का कहना है कि सृष्टि में प्रेम का अर्थ है कि हमारे आसपास के लोगों, रिश्तों और परिस्थितियों में हमें प्रेम दिखाई दे। जब कोई हमारे साथ अच्छा व्यवहार करता है, हमारी सहायता करता है या हमें अपनापन देता है, तब हमारे मन में उसके प्रति प्रेम उत्पन्न होता है। लेकिन यह प्रेम हमेशा एक जैसा नहीं रहता। परिस्थितियां बदलने पर भावनाएं भी बदल सकती हैं। जिस व्यक्ति से आज प्रेम है, उसके किसी व्यवहार से कल मन में नाराजगी पैदा हो सकती है। इसलिए सृष्टि में दिखाई देने वाला प्रेम कभी-कभी समय और परिस्थितियों के साथ समाप्त भी हो जाता है।

दृष्टि में प्रेम होने का वास्तविक अर्थ

दृष्टि में प्रेम होना इससे कहीं अधिक गहरा भाव है। इसका अर्थ है कि हमारी नजर ही प्रेम से भर जाए। जब हमारी दृष्टि में प्रेम का भाव आ जाता है, तब हम दूसरों को उनके दोषों के आधार पर देखना बंद कर देते हैं। हमें सामने वाले के भीतर भी अच्छाई और अपनापन दिखाई देने लगता है। हमारी सोच सकारात्मक हो जाती है और छोटी-छोटी कमियां हमें बड़ी नहीं लगतीं।

पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज के बताए भाव के अनुसार, यदि हमारी दृष्टि पर प्रेम का पर्दा पड़ जाए तो जिस व्यक्ति या परिस्थिति में हमें पहले नफरत दिखाई देती थी, उसमें भी प्रेम नजर आने लगता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि गलत को सही मान लिया जाए, बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम हर चीज को नफरत और क्रोध की नजर से देखने के बजाय प्रेम और समझदारी की दृष्टि से देखने लगें।

प्रेम की दृष्टि से पूरी सृष्टि है सुंदर 

पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज कहते हैं कि जब मन में प्रेम होता है तो दुनिया को देखने का नजरिया बदल जाता है। वही व्यक्ति, वही परिवार और वही परिस्थितियां जो पहले हमें परेशान करती थीं, उनके प्रति हमारा भाव बदलने लगता है। मन में प्रेम होने के कारण हम दूसरों की गलतियों को समझने का प्रयास करते हैं। धीरे-धीरे हमारे भीतर क्षमा, सहनशीलता और करुणा का भाव विकसित होता है। यही कारण है कि कहा जाता है कि यदि दृष्टि प्रेममयी हो जाए तो पूरी सृष्टि प्रेममयी दिखाई देने लगती है। संसार को बदलने से पहले अपनी दृष्टि को बदलना जरूरी है। हमारी नजर जैसी होगी, हमें संसार भी वैसा ही दिखाई देगा।

प्रेममयी दृष्टि से जीवन में आती है शांति

दृष्टि में प्रेम होने से मनुष्य का जीवन भी शांत और सुखी बनता है। नफरत और शिकायत मन को अशांत करती हैं, जबकि प्रेम मन को हल्का और प्रसन्न बनाता है। यदि हम हर व्यक्ति को प्रेम, करुणा और समझ की दृष्टि से देखने का प्रयास करें तो रिश्तों में मधुरता बढ़ सकती है और जीवन में तनाव कम हो सकता है। सृष्टि में प्रेम मिलना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि हमारी दृष्टि प्रेम से भर जाए। सृष्टि का प्रेम परिस्थितियों के साथ बदल सकता है, लेकिन प्रेममयी दृष्टि हमें हर परिस्थिति में अच्छाई देखने की शक्ति देती है। जब हमारी आंखों और मन में प्रेम का भाव आ जाता है, तब नफरत के बीच भी प्रेम की संभावना दिखाई देने लगती है और पूरी सृष्टि हमें प्रेम से भरी हुई नजर आती है। यही प्रेममयी दृष्टि जीवन को सुंदर, शांत और सार्थक बनाने का मार्ग दिखाती है।

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