Sanatan Culture: प्रह्लाद और भगवान श्रीनृसिंह की कथा हमें यह संदेश देती है कि मनुष्य को अपनी शक्ति, धन और सफलता पर अहंकार नहीं करना चाहिए। हमें धर्म, सत्य, वेद, गौ, संतों और भगवान के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए।
Importance of Vedas: स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज ने भगवान श्रीनृसिंह और भक्त प्रह्लाद के प्रसंग को समझाते हुए बताया कि भगवान किसी व्यक्ति का विनाश केवल इसलिए नहीं करते कि वह शक्तिशाली, धनवान या असुर प्रवृत्ति का है। भगवान उसे अपनी गलतियों को सुधारने का अवसर देते हैं। जब मनुष्य बार-बार समझाने के बाद भी अधर्म के रास्ते पर चलता रहता है और उसके भीतर भगवान, धर्म तथा संतों के प्रति द्वेष बढ़ने लगता है, तब उसके विनाश का समय निकट आ जाता है।
कथा के अनुसार, भक्त प्रह्लाद ने भगवान श्रीनृसिंह से पूछा कि असुर लोग इतने शक्तिशाली और धनवान क्यों हो जाते हैं? यदि उनके भीतर इतनी बुरी प्रवृत्तियां होती हैं तो भगवान उन्हें शुरुआत में ही समाप्त क्यों नहीं कर देते? प्रह्लाद के मन में अपने पिता हिरण्यकशिपु को लेकर भी यही प्रश्न था कि भगवान ने उनके अत्याचारों को इतने लंबे समय तक क्यों सहन किया।
भगवान ने समझाया कि संसार में हर जीव को अपने कर्मों का फल भोगने और स्वयं को सुधारने का अवसर मिलता है। इसलिए भगवान तुरंत किसी का अंत नहीं करते। वे पहले उसे चेतने का अवसर देते हैं।
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जब मनुष्य धर्म से द्वेष करने लगे
स्वामी जी महाराज ने बताया कि शास्त्रों में इस बात का संकेत मिलता है कि जब किसी व्यक्ति के मन में देवताओं, वेदों, गौ माता, ब्राह्मणों, साधु-संतों, धर्म और स्वयं भगवान के प्रति द्वेष उत्पन्न होने लगे, तब उसके पतन का समय शुरू हो जाता है। अर्थात केवल धन, शक्ति या पद किसी व्यक्ति को विनाश की ओर नहीं ले जाते। असली कारण उसके भीतर पैदा होने वाला अहंकार, अधर्म और ईश्वर तथा धर्म के प्रति विरोध है। जब मनुष्य अपनी शक्ति के नशे में सत्य और मर्यादा को भूल जाता है, तब उसका विवेक धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
भगवान क्यों करते हैं देर?
भगवान की ओर से होने वाला विलंब वास्तव में एक अवसर होता है। भगवान चाहते हैं कि मनुष्य अपनी भूल समझे, अहंकार छोड़े और धर्म के मार्ग पर वापस लौट आए। लेकिन जब वह बार-बार अवसर मिलने के बाद भी अत्याचार और अधर्म को नहीं छोड़ता, तब उसके कर्म ही उसके विनाश का कारण बन जाते हैं।
कथा से मिलने वाली सीख
प्रह्लाद और भगवान श्रीनृसिंह की कथा हमें यह संदेश देती है कि मनुष्य को अपनी शक्ति, धन और सफलता पर अहंकार नहीं करना चाहिए। हमें धर्म, सत्य, वेद, गौ, संतों और भगवान के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए। जब मनुष्य के भीतर अहंकार और द्वेष बढ़ता है, तो उसका पतन निश्चित रूप से शुरू हो जाता है। भगवान हमेशा सुधार का अवसर देते हैं, लेकिन जब अधर्म अपनी सीमा पार कर देता है, तब भगवान धर्म की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करते हैं।