Pitru Tarpan Vidhi: तर्पण और पंचबलि के बाद भगवान को भोग लगाकर ब्राह्मण भोजन कराने की बात कही गई है। जिस दिन पितृ तिथि हो, उस दिन ब्राह्मण भोजन को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया गया है।
Pitru Paksha Niyam: पितृ पक्ष को सनातन परंपरा में पूर्वजों के स्मरण, तर्पण, श्राद्ध और दान के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मिक शांति और तृप्ति के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज ने बताया कि यदि किसी कारण से विधिवत श्राद्ध करना संभव न हो, तो घर पर सरल तरीके से तर्पण किया जा सकता है। उनके अनुसार तर्पण और श्राद्ध दो अलग-अलग विधियां हैं और तर्पण के माध्यम से भी पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जा सकती है।
स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसे सपिंडीकरण होने तक प्रेत कहा जाता है। सपिंडीकरण की परंपरा अलग-अलग स्थानों पर अलग हो सकती है, लेकिन उनके बताए अनुसार वार्षिक श्राद्ध के साथ सपिंडीकरण की विधि की जाती है। इसके बाद मृतात्मा को पितर के रूप में माना जाता है। पितृ पक्ष में होने वाला पार्वण श्राद्ध मुख्य रूप से उन पितरों के लिए बताया गया है जिनका सपिंडीकरण हो चुका है।
हालांकि, तर्पण को लेकर उन्होंने बताया कि यह अधिक व्यापक रूप से किया जा सकता है। जिनकी मृत्यु को अभी एक वर्ष पूरा नहीं हुआ है, उनके लिए भी तर्पण किया जा सकता है। इस प्रकार श्राद्ध और तर्पण को एक ही मानना उचित नहीं है।
Trending Video
किन चीजों की होगी जरूरत?
घर पर तर्पण करने के लिए सबसे पहले स्वच्छ जल की आवश्यकता होती है। इसमें गंगाजल या किसी तीर्थ का जल मिलाया जा सकता है। इसके अलावा काले तिल, कुशा, बैठने के लिए आसन और एक पात्र की आवश्यकता होती है। स्वामी जी ने पितृ कार्य में चांदी के पात्र को विशेष महत्व बताया है। यदि चांदी का पात्र उपलब्ध न हो तो तांबे के पात्र का प्रयोग किया जा सकता है, जबकि स्टील के पात्र का प्रयोग नहीं करने की बात कही गई है। तर्पण के लिए जल में थोड़ा दूध, सफेद पुष्प, कुशा और काला तिल मिलाया जा सकता है। तर्पण करने से पहले जिन पितरों के नाम और गोत्र ज्ञात हों, उन्हें लिखकर या याद करके रखना चाहिए।
तर्पण से पहले संकल्प कैसे लें?
स्नान करने के बाद तर्पण का संकल्प लिया जाता है। सबसे पहले भगवान विष्णु का स्मरण किया जाता है। इसके बाद संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि और वार का उल्लेख करते हुए अपने गोत्र का नाम लिया जाता है। फिर पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण करने का संकल्प किया जाता है। जिन लोगों को अपना गोत्र ज्ञात नहीं है, उनके लिए स्वामी जी ने कश्यप गोत्र का उल्लेख करने की बात कही। संकल्प के दौरान भगवान के चरणों में अक्षत और पुष्प अर्पित कर दीपक जलाने की भी बात कही गई है।
देवता और ऋषियों का तर्पण
पितृ तर्पण से पहले देवताओं और ऋषियों का तर्पण करने की परंपरा बताई गई है। देवताओं के तर्पण के समय पूर्व दिशा की ओर मुख किया जाता है। इसके लिए हाथ के देवतीर्थ से जल अर्पित किया जाता है। इस दौरान “ॐ देवान् तर्पयामि” का उच्चारण तीन बार करने की बात कही गई है। इसके बाद ऋषि तर्पण किया जाता है। ऋषियों के लिए उत्तर दिशा की ओर मुख किया जाता है और हाथ के ऋषितीर्थ से जल अर्पित किया जाता है। इस दौरान गुरु परंपरा का स्मरण करते हुए ऋषियों और गुरुजनों को तर्पण किया जाता है।
पितरों का तर्पण किस दिशा में करें?
पितरों के तर्पण के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख किया जाता है। हाथ के अंगूठे के नीचे वाले हिस्से को पितृतीर्थ कहा गया है और इसी स्थान से जल अर्पित किया जाता है। जल में काला तिल, कुशा और अन्य सामग्री मिलाई जाती है। पितरों को तीन पीढ़ियों के रूप में स्मरण करने की बात कही गई है। माता-पिता को वसु रूप, दादा-दादी को रुद्र रूप और परदादा-परदादी को आदित्य रूप माना जाता है। प्रत्येक के नाम और गोत्र का स्मरण करते हुए तीन बार जल अर्पित किया जा सकता है।
ज्ञात-अज्ञात पितरों के लिए तर्पण
स्वामी जी ने बताया कि यदि किसी व्यक्ति के मामा या पुत्र न हों, तो पुत्री का पुत्र भी अपने नाना-नानी और पूर्वजों के लिए तर्पण कर सकता है। इसी प्रकार परिवार में जिन पूर्वजों के नाम और गोत्र ज्ञात नहीं हैं, उनके लिए भी सामूहिक रूप से तर्पण किया जा सकता है। ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के लिए तर्पण करते समय उनके कल्याण और तृप्ति की भावना रखनी चाहिए। जिन लोगों की संतान नहीं हुई या जिनका कोई वंशज नहीं है, उनके लिए भी विशेष रूप से जल अर्पित करने की बात कही गई है।
पितृ पक्ष में पंचबलि का महत्व
स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज ने पितृ पक्ष में तर्पण के साथ पंचबलि को भी महत्वपूर्ण बताया। इसमें गोबलि, श्वानबलि, काकबलि, देवबलि और पिपीलिका बलि शामिल हैं। गो माता के लिए भोजन निकालना, कुत्तों के लिए अन्न देना, कौवों के लिए भोजन रखना और चीटियों तथा अन्य जीवों के लिए अन्न निकालना इस परंपरा का हिस्सा बताया गया है। देवबलि के लिए भगवान को भोग लगाने और हवन या ब्राह्मण भोजन के माध्यम से देवताओं को समर्पण करने की बात कही गई है। इस प्रकार पंचबलि के माध्यम से पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं और देवताओं के प्रति भी सम्मान व्यक्त किया जाता है।
तर्पण के बाद क्या करें?
तर्पण और पंचबलि के बाद भगवान को भोग लगाकर ब्राह्मण भोजन कराने की बात कही गई है। जिस दिन पितृ तिथि हो, उस दिन ब्राह्मण भोजन को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया गया है। इसके बाद स्वयं प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा बताई गई है। पितृ पक्ष में तर्पण करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा और पूर्वजों के प्रति सम्मान की भावना रखना है। स्वामी जी के अनुसार परिवार के सभी सदस्य, जिनमें महिलाएं और बेटियां भी शामिल हैं, तर्पण कर सकती हैं। पितरों के स्मरण के साथ किया गया तर्पण परिवार की धार्मिक परंपरा में श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम माना गया है।