Lord Ganesh: भगवान गणेश की यह कथा महिमा नहीं बताती, बल्कि यह भी सिखाती है कि सफलता के लिए केवल गति और शक्ति ही जरूरी नहीं होती। सही बुद्धि, श्रद्धा और विवेक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
Bhagwan Ganesh Ki Mahima: सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से की जाती है। चाहे घर में पूजा हो, कोई धार्मिक अनुष्ठान हो, विवाह हो या किसी नए कार्य की शुरुआत, सबसे पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता है। उन्हें ‘प्रथम पूजित’ यानी सबसे पहले पूजा जाने वाला देवता माना गया है, लेकिन आखिर गणेश जी को यह विशेष सम्मान कैसे मिला? राजन जी महाराज ने इससे जुड़ी एक सुंदर और प्रेरणादायक कथा बताई है।
कथा के अनुसार एक बार देवताओं के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया कि सबसे पहले किस देवता की पूजा होनी चाहिए। सभी देवता स्वयं को इस सम्मान का अधिकारी मान रहे थे। विवाद बढ़ने पर यह तय किया गया कि जो देवता पूरी सृष्टि का चक्कर लगाकर सबसे पहले वापस आएगा, उसे ही ‘प्रथम पूजित’ होने का अधिकार मिलेगा।
यह सुनते ही सभी देवता अपनी-अपनी सवारी पर सवार होकर निकल पड़े। किसी के पास तेज गति से चलने वाली सवारी थी तो कोई अपने विशेष वाहन पर सवार होकर पूरी सृष्टि की परिक्रमा करने के लिए निकल गया।
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गणेश जी हो गए चिंतित
भगवान गणेश भी इस प्रतियोगिता में शामिल होना चाहते थे, लेकिन उनके सामने एक बड़ी समस्या थी। उनकी सवारी भगवान शिव का प्रिय वाहन छोटा सा मूषक यानी चूहा था। गणेश जी ने सोचा कि बाकी देवताओं की सवारियां बहुत तेज हैं, जबकि उनका मूषक इतनी लंबी यात्रा कैसे पूरी कर पाएगा? गणेश जी निराश होकर बैठ गए। तभी नारद मुनि वहां पहुंचे और उन्होंने गणेश जी से उनकी चिंता का कारण पूछा। गणेश जी ने कहा कि वह इस प्रतियोगिता में जीत नहीं सकते, क्योंकि उनकी सवारी इतनी तेज नहीं है कि वह पूरी सृष्टि का चक्कर लगाकर सबसे पहले लौट सके।
नारद मुनि ने बताया उपाय
नारद मुनि ने गणेश जी से पूछा कि क्या वह ‘प्रथम पूजित’ बनना चाहते हैं। गणेश जी ने कहा कि ऐसा सम्मान कौन नहीं पाना चाहेगा। तब नारद मुनि ने उन्हें एक उपाय बताया। उन्होंने कहा कि भगवान का नाम ही पूरी सृष्टि का आधार है। इसलिए गणेश जी धरती पर ‘राम’ नाम लिखें और उसके चारों ओर एक चक्कर लगा लें। यह पूरी सृष्टि की परिक्रमा करने के समान माना जाएगा।
गणेश जी की बुद्धि ने दिलाई जीत
गणेश जी ने नारद मुनि की बात मानी। उन्होंने भूमि पर ‘राम’ नाम लिखा और श्रद्धा के साथ उसके चारों ओर परिक्रमा करके भगवान के पास लौट आए। जब बाकी देवता पूरी सृष्टि का चक्कर लगाकर वापस आए, तब गणेश जी पहले ही वहां उपस्थित थे। गणेश जी ने समझाया कि जिस नाम में स्वयं भगवान का वास है, उस नाम की परिक्रमा करना पूरी सृष्टि की परिक्रमा करने के समान है। उनकी श्रद्धा, बुद्धि और भक्ति से सभी प्रभावित हुए और उन्हें ‘प्रथम पूजित’ का सम्मान प्राप्त हुआ।
गणेश जी की महिमा से मिलती है ये सीख
यह कथा केवल गणेश जी की महिमा नहीं बताती, बल्कि यह भी सिखाती है कि सफलता के लिए केवल गति और शक्ति ही जरूरी नहीं होती। सही बुद्धि, श्रद्धा और विवेक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसी कारण किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है, ताकि कार्य में बुद्धि, विवेक और मंगल की प्राप्ति हो।