Shani Dev: शनिदेव सूर्यदेव के पुत्र हैं, फिर भी इनके बीच शत्रुता का भाव पुराणों में वर्णित है। इस शत्रुता की जड़ संज्ञा और छाया की कथा में है।
Shani Dev Mythological Story: हिंदू धर्म में नवग्रहों में शनिदेव को न्याय के देवता और कर्मफल के दाता के रूप में पूजा जाता है। शनिवार का दिन उनके नाम से जाना जाता है और इस दिन उनकी पूजा-अर्चना, व्रत और उपाय विशेष रूप से किए जाते हैं। शनिदेव की पूजा में कई नियमों का पालन किया जाता है, जिनमें से एक महत्वपूर्ण नियम तांबे के बर्तनों का उपयोग न करना है। अन्य देवी-देवताओं की पूजा में तांबा शुभ माना जाता है, लेकिन शनिदेव की पूजा में इसका उपयोग पूरी तरह वर्जित है। इसकी पौराणिक पृष्ठभूमि सूर्यदेव और शनिदेव के बीच के संबंध से जुड़ी हुई है।
शनिदेव की पूजा के मुख्य नियम
शनिदेव की पूजा में लोहे के बर्तनों का उपयोग किया जाता है। सरसों का तेल लोहे के पात्र में रखकर चढ़ाया जाता है। काले तिल, काले वस्त्र, नीले फूल और फल इनकी पूजा में अर्पित किए जाते हैं। शनिदेव को लाल रंग की वस्तुएं नहीं चढ़ाई जातीं, क्योंकि लाल रंग मंगल से संबंधित है और मंगल शनि के शत्रु माने जाते हैं। पूजा के दौरान शनिदेव की आंखों में सीधे नहीं देखा जाता। इन नियमों का पालन करने से शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है और साढ़ेसाती या ढैय्या जैसे दोषों से राहत मिलती है।
तांबे के बर्तनों का निषेध इन नियमों का हिस्सा है। ज्योतिष शास्त्र और पुराणों के अनुसार तांबा सूर्यदेव की धातु है। सूर्य पूजा में तांबे के लोटे से अर्घ्य दिया जाता है। शनिदेव की पूजा में तांबे का स्पर्श या उपयोग करने से शनिदेव क्रोधित हो सकते हैं, ऐसा माना जाता है।
सूर्यदेव और शनिदेव का पौराणिक संबंध
शनिदेव सूर्यदेव के पुत्र हैं, फिर भी इनके बीच शत्रुता का भाव पुराणों में वर्णित है। इस शत्रुता की जड़ संज्ञा और छाया की कथा में है। राजा दक्ष की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्यदेव से हुआ था। संज्ञा सूर्यदेव के प्रचंड तेज से बहुत परेशान रहती थीं। वे इस तेज को सहन नहीं कर पाती थीं। जब स्थिति असहनीय हो गई तो संज्ञा ने अपने पिता दक्ष से इस समस्या का समाधान मांगा, लेकिन कोई राह नहीं निकली। अंत में संज्ञा ने एक योजना बनाई। उन्होंने अपनी छाया रूप एक दूसरी स्त्री का निर्माण किया, जिसे छाया कहा गया। छाया सूर्यदेव के तेज को सहन कर सकती थी।
संज्ञा ने छाया को अपने बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी और स्वयं तपस्या करने के लिए चली गईं। छाया ने संज्ञा का रूप धारण कर सूर्यदेव के साथ जीवन व्यतीत किया। उनके गर्भ से शनिदेव का जन्म हुआ।
शनिदेव के जन्म की कथा और सूर्य देव का संदेह
जब शनिदेव का जन्म हुआ तो सूर्यदेव को उनके रूप-रंग में कुछ असामान्यता दिखाई दी। शनिदेव का रंग काला था और उनकी आकृति में भी अंतर था। सूर्यदेव ने संदेह किया कि यह बच्चा उनका नहीं है। उन्होंने छाया पर आरोप लगाया और बच्चे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। सूर्यदेव के इस व्यवहार से छाया और शनिदेव दोनों आहत हुए।
शनिदेव ने पिता के इस अपमान को जीवन भर नहीं भुलाया। उन्होंने सूर्यदेव के प्रति शत्रुता का भाव विकसित कर लिया। कुछ कथाओं में यह भी बताया जाता है कि शनिदेव ने तपस्या की और भगवान शिव की कृपा से वर प्राप्त किया। उन्होंने सूर्यदेव पर अपनी वक्र दृष्टि डाली, जिससे सूर्यदेव भी प्रभावित हुए। इस घटना ने पिता-पुत्र के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया।
इस प्रकार पिता-पुत्र का संबंध होते हुए भी दोनों में शत्रुता का भाव स्थापित हो गया। शनिदेव कर्म के न्यायाधीश हैं और वे किसी भी अन्याय को सहन नहीं करते। सूर्यदेव द्वारा उनके जन्म में किया गया संदेह और अपमान इस शत्रुता का मुख्य कारण माना जाता है।
तांबे से सूर्य का संबंध और पूजा में निषेध
पुराणों और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्यदेव की धातु तांबा है। तांबा सूर्य की ऊर्जा को धारण करता है, इसलिए सूर्य पूजा, सूर्य अर्घ्य और संबंधित अनुष्ठानों में तांबे के बर्तनों का उपयोग शुभ फलदायी माना जाता है। तांबे का लोटा, थाली या अन्य पात्र सूर्य की पूजा में प्रमुखता से प्रयोग होते हैं।
चूंकि शनिदेव और सूर्यदेव में शत्रुता है, इसलिए शनिदेव की पूजा में सूर्य से संबंधित किसी भी वस्तु का उपयोग नहीं किया जाता। तांबे के बर्तन में जल, तेल या अन्य सामग्री रखकर शनिदेव को अर्पित करने से उनकी पूजा में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि शनिदेव की पूजा लोहे के बर्तनों में ही करनी चाहिए। लोहा शनिदेव से सीधे जुड़ा हुआ माना जाता है। लोहे के पात्र में सरसों का तेल चढ़ाने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)