Temple Facts: मंदिर जाते समय श्रद्धालु कई धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं। कोई मंदिर में प्रवेश करने से पहले घंटी बजाता है, कोई भगवान के दर्शन से पहले हाथ जोड़कर प्रणाम करता है, तो कोई परिक्रमा करता है। इन्हीं परंपराओं में एक परंपरा ऐसी भी है, जिसे लगभग हर व्यक्ति निभाता है। वह है मंदिर में प्रवेश करने से पहले उसकी सीढ़ियों को हाथ लगाकर प्रणाम करना। कई लोग ऐसा बचपन से करते आ रहे हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आखिर मंदिर की सीढ़ियों को प्रणाम करने के पीछे धार्मिक मान्यता क्या है और इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है। आइए जानते हैं कि सनातन परंपरा में इस परंपरा का क्या महत्व बताया गया है।
मंदिर की सीढ़ियों को क्यों किया जाता है प्रणाम?
सनातन धर्म में मंदिर को केवल पूजा करने का स्थान नहीं, बल्कि भगवान का साक्षात निवास माना गया है। ऐसी मान्यता है कि मंदिर का प्रत्येक भाग पवित्र होता है। मंदिर का शिखर, ध्वज, गर्भगृह, द्वार, चौखट और सीढ़ियां, सभी देवालय का अभिन्न हिस्सा हैं। जब कोई श्रद्धालु मंदिर की पहली सीढ़ी पर कदम रखता है, तभी से वह भगवान के धाम में प्रवेश करना शुरू कर देता है। इसलिए मंदिर की सीढ़ियों को प्रणाम करना उस पवित्र स्थान और वहां विराजमान भगवान के प्रति सम्मान प्रकट करने का तरीका माना जाता है।
भगवान की चरण पादुका का प्रतीक
मंदिर की सीढ़ियों को प्रणाम करने के पीछे सबसे प्रमुख धार्मिक मान्यता भगवान की चरण पादुका से जुड़ी हुई मानी जाती है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार मंदिर की पहली सीढ़ी से ही भगवान के धाम की शुरुआत हो जाती है। इसलिए कई प्राचीन मंदिरों और परंपराओं में सीढ़ियों को भगवान के चरणों का प्रतीक माना गया है। जिस प्रकार भक्त भगवान के चरणों में सिर झुकाकर आशीर्वाद प्राप्त करता है, उसी प्रकार मंदिर में प्रवेश करने से पहले सीढ़ियों को स्पर्श कर माथे से लगाना भगवान की चरण वंदना के समान माना जाता है। इसी कारण कई श्रद्धालु सीढ़ियों को हाथ लगाने के बाद उसी हाथ को अपने माथे या आंखों से लगाते हैं। यह भाव इस बात का प्रतीक है कि भक्त भगवान के चरणों की धूल को भी अपने लिए सौभाग्य मानता है।
चरण स्पर्श की परंपरा से जुड़ा है यह भाव
सनातन धर्म में चरण स्पर्श का विशेष महत्व बताया गया है। माता-पिता, गुरु, संत और देवताओं के चरणों को प्रणाम करना सम्मान, श्रद्धा और आशीर्वाद प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है। इसी परंपरा का विस्तार मंदिर की सीढ़ियों तक भी माना जाता है। चूंकि मंदिर भगवान का धाम है, इसलिए उसकी सीढ़ियों को भी भगवान के चरणों का प्रतीक मानकर प्रणाम किया जाता है। यही कारण है कि अनेक लोग सीढ़ियों पर पैर रखने से पहले उन्हें स्पर्श कर क्षमा भी मांगते हैं।
भगवान के धाम में प्रवेश से पहले विनम्रता का भाव
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान के सामने अहंकार का कोई स्थान नहीं होता, इसलिए मंदिर में प्रवेश करने से पहले श्रद्धालु झुककर सीढ़ियों को प्रणाम करता है। यह इस बात का संकेत माना जाता है कि वह अपने अहंकार, अभिमान और सांसारिक चिंताओं को बाहर छोड़कर भगवान के दरबार में प्रवेश कर रहा है। यही कारण है कि मंदिर की सीढ़ियों को प्रणाम करना केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि समर्पण और विनम्रता का प्रतीक भी माना जाता है।
मंदिर की चौखट और सीढ़ियों का एक समान महत्व
कई प्राचीन मंदिरों में श्रद्धालु केवल सीढ़ियों को ही नहीं, बल्कि मंदिर की चौखट को भी प्रणाम करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि चौखट वह स्थान है जहां से भक्त सांसारिक जीवन से निकलकर ईश्वर के सान्निध्य में प्रवेश करता है, इसलिए कई लोग पहले चौखट या पहली सीढ़ी को स्पर्श करते हैं और उसके बाद भगवान के दर्शन के लिए आगे बढ़ते हैं। इसे देवालय की मर्यादा का सम्मान माना जाता है।
क्या शास्त्रों में इसका उल्लेख मिलता है?
आगम शास्त्रों और मंदिर परंपराओं में मंदिर को देवस्वरूप माना गया है। इन ग्रंथों में मंदिर की पवित्रता, उसमें प्रवेश करने की विधि और आचरण का विस्तार से वर्णन मिलता है। यद्यपि सभी शास्त्रों में मंदिर की सीढ़ियों को स्पर्श करना अनिवार्य नियम के रूप में नहीं बताया गया है, लेकिन मंदिर के प्रत्येक भाग को श्रद्धा और सम्मान देने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। इसी धार्मिक परंपरा के कारण मंदिर की सीढ़ियों, चौखट और प्रवेश द्वार को प्रणाम करने की परंपरा आज भी अनेक मंदिरों में निभाई जाती है।
चरण पादुका की परंपरा से कैसे जुड़ती है यह मान्यता?