Hindu Temple Facts: गर्भगृह एक ऐसा स्थान है जिसे बहुत पवित्र माना जाता है लेकिन ऐसा क्यों क्या ऐसा इसलिए कि वहां पर भगवान की मूर्ति स्थापित होती है या इसके पीछे कोई और वजह है अगर आप जानना चाहते हैं तो इसे लेख को पढ़ें
Garbhagriha Ka Mahatva Kya Hai: क्या आपने कभी सोचा है कि मंदिर में प्रवेश करते ही सभी लोग सीधे भगवान के दर्शन के लिए उस छोटे से कक्ष की ओर जाते हैं जिसे गर्भगृह कहा जाता है इस स्थान पर जैसे ही लोग पहुंचते हैं उन्हें एक अलग प्रकार की श्रद्धा और शांति देखने को मिलती है आपको बता दें कि गर्भगृह एक ऐसा स्थान है जिसे बहुत पवित्र माना जाता है लेकिन ऐसा क्यों क्या ऐसा इसलिए कि वहां पर भगवान की मूर्ति स्थापित होती है या इसके पीछे कोई और वजह है अगर आप जानना चाहते हैं कि गर्भगृह को इतना पवित्र क्यों माना जाता है तो इस लेख को अंत तक पढ़िए।
गर्भगृह का अर्थ क्या है
सबसे पहले "गर्भगृह" शब्द का अर्थ जानिए। "गर्भ" यानी भीतर का सबसे सुरक्षित और पवित्र स्थान, और "गृह" यानी घर। जिस तरह मां के गर्भ में नया जीवन जन्म लेने से पहले सुरक्षित रहता है, उसी तरह मंदिर का गर्भगृह भी दिव्य ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।
कैसे तय किया जाता है गर्भगृह का स्थान
जब किसी मंदिर का निर्माण किया जाता है, तो सबसे पहले गर्भगृह की जगह तय की जाती है। यह कोई साधारण कमरा नहीं होता, बल्कि वास्तु शास्त्र और आगम शास्त्र के अनुसार बेहद सोच-समझकर बनाया जाता है। माना जाता है कि मंदिर की सारी सकारात्मक ऊर्जा इसी स्थान पर सबसे अधिक एकत्रित होती है। क्योंकि मूर्ति स्थापित करने से पहले वहां प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। इस विशेष वैदिक प्रक्रिया के माध्यम से भगवान का दिव्य स्वरूप उस प्रतिमा में स्थापित करने की मान्यता है। इसके बाद वह केवल पत्थर या धातु की मूर्ति नहीं रहती, बल्कि भक्तों के लिए साक्षात भगवान का निवास बन जाती है।
गर्भगृह को क्यों कहा जाता है मंदिर का "हृदय"
आपने एक और बात जरूर देखी होगी कि गर्भगृह में हमेशा हल्का अंधेरा रहता है। वहां तेज रोशनी या बड़ी-बड़ी खिड़कियां नहीं होतीं। जिसका अर्थ है जब बाहर की चकाचौंध कम होती है, तब मन अपने आप भीतर की ओर जाता है। गर्भगृह हमें यह सिखाता है कि भगवान को पाने के लिए बाहरी नहीं, बल्कि अंदर की यात्रा करनी पड़ती है। यही कारण है कि वहां पहुंचते ही मन अपने आप शांत होने लगता है।
गर्भगृह का आकार छोटा क्यों होता है
आपके मन में गर्भगृह को देखकर कभी न कभी ये सवाल मन में जरूर आया होगा कि गर्भगृह छोटा है लेकिन बाहर का प्रांगण काफी बड़ा तो आपको बता दे कि ऐसा इसलिए माना जाता है कि भगवान के सामने पहुंचने पर व्यक्ति का अहंकार छोटा हो जाए। गर्भगृह की सीमित जगह हमें विनम्रता और समर्पण का अनुभव कराती है। वहां जाकर इंसान अपने पद, धन और पहचान को भूलकर केवल एक भक्त बन जाता है। इसी वजह से गर्भगृह में प्रवेश के भी कुछ नियम बनाए गए हैं। वहां स्वच्छता, पवित्रता और अनुशासन का विशेष ध्यान रखा जाता है। कई प्राचीन मंदिरों में केवल पुजारियों को ही गर्भगृह के भीतर जाने की अनुमति होती है, क्योंकि वे विशेष धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को बड़ा या छोटा दिखाना नहीं, बल्कि उस स्थान की धार्मिक मर्यादा बनाए रखना है।
गर्भ-गृह का वैज्ञानिक-आध्यात्मिक रहस्य
गर्भ-गृह के वैज्ञानिक या आध्यात्मिक रहस्य की अगर बात करें तो विश्वकर्मा वास्तु शास्त्र के अनुसार, मंदिर का हर हिस्सा मानव शरीर के किसी खास हिस्से से मेल खाता है। मंदिर के लेआउट को देखने पर यह साफ पता चलता है कि मंदिर का ढांचा किस तरह मानव शरीर के आकार से मिलता-जुलता है।मंदिर की तुलना मानव शरीर से की जाती है, जिसमें गर्भ-गृह दोनों भौंहों के बीच के हिस्से वह जगह जहाँ तिलक या बिंदी लगाई जाती है और जिसे आज्ञा चक्र भी कहा जाता है के समान माना जाता है। इसी जगह पर ईश्वर सूक्ष्म रूप में निवास करते हैं। आत्मा जो परम चेतना का अंश है शरीर के ऊपरी हिस्से के केंद्र में रहती है। भगवद्गीता में भी यही बात कही गई है "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। इसका अर्थ है कि ईश्वर सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं। यहाँ "हृदय" का अर्थ आध्यात्मिक हृदय से है; ईश्वर इसी "तीसरी आँख" में निवास करते हैं। असल में, बाहरी मंदिर का गर्भ-गृह इसी आंतरिक मंदिर की ओर इशारा करता है। यही गर्भ-गृह* का वैज्ञानिक आध्यात्मिक रहस्य है
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)