रत्नेश्वर महादेव मंदिर मणिकर्णिका घाट के नीचे बना है। घाट के नीचे होने की वजह से यह मंदिर साल में 8 महीने गंगा के पानी में आधा डूबा रहता है।
Ratneshwar Mahadev Temple: वाराणसी में सैकड़ों मंदिर हैं, लेकिन सभी मंदिरों में प्राचीन रत्नेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र है। इस मंदिर की खासियत यह है कि यह करीब 400 सालों से 9 डिग्री के कोण पर झुका हुआ है। रत्नेश्वर महादेव मंदिर मणिकर्णिका घाट के नीचे बना है। घाट के नीचे होने की वजह से यह मंदिर साल में 8 महीने गंगा के पानी में आधा डूबा रहता है।
अद्भुत है इसकी संरचना
इस मंदिर में अद्भुत शिल्पकला की गई है। कलात्मक रूप से यह बेहद शानदार है। वाराणसी का रत्नेश्वर मंदिर महादेव को समर्पित है। इसे मातृऋण महादेव, वाराणसी या काशी करवट का झुका हुआ मंदिर भी कहा जाता है। वाराणसी या बनारस में कई मंदिर हैं, लेकिन रत्नेश्वर मंदिर जैसा कोई दूसरा मंदिर नहीं है। इसकी खास बात इसे दूसरे मंदिरों से अलग बनाती है। दरअसल, दूसरे मंदिरों से अलग यह मंदिर एक कोण पर खड़ा है। रत्नेश्वर मंदिर मणिकर्णिका घाट और सिंधिया घाट के बीच स्थित है। यह साल के ज्यादातर समय नदी के पानी में डूबा रहता है। कभी-कभी पानी का स्तर मंदिर के शीर्ष तक भी बढ़ जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 19वीं सदी के मध्य में हुआ था। मंदिर को 1860 के दशक से अलग-अलग तस्वीरों में दर्शाया गया है।
इस मंदिर में अजीबोगरीब रहस्य हैं। पहले इस मंदिर के छज्जे की ऊंचाई जमीन से 7 से 8 फीट हुआ करती थी, जबकि अब यह सिर्फ 6 फीट रह गई है। हालांकि यह मंदिर सैकड़ों सालों से 9 डिग्री पर झुका हुआ है, लेकिन समय के साथ इसका झुकाव बढ़ता जा रहा है, जिसका पता वैज्ञानिक भी नहीं लगा पाए हैं।
मंदिर क्यों रहता है जलमग्न, जानिए वजह
यह मंदिर मणिकर्णिका घाट के ठीक नीचे है, जिसके कारण जब गंगा का जलस्तर बढ़ता है तो यह मंदिर 6 से 8 महीने तक पानी में डूबा रहता है। कई बार पानी चोटी के ऊपर तक भर जाता है। ऐसे में मंदिर में सिर्फ 3-4 महीने ही पूजा-अर्चना हो पाती है। 6 से 8 महीने तक पानी में रहने के बावजूद इस मंदिर को कोई नुकसान नहीं होता है।
भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में हुआ था। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण अमेठी के राजघराने ने 1857 में करवाया था।
मंदिर की प्राचीन मान्यताएं
इस मंदिर के बारे में कई पौराणिक कथाएं प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि अहिल्याबाई होल्कर ने अपने शासनकाल में बनारस के आसपास कई मंदिर बनवाए थे। अहिल्याबाई की एक दासी थी जिसका नाम रत्नाबाई था। रत्नाबाई मणिकर्णिका घाट के आसपास शिव मंदिर बनवाना चाहती थीं। ऐसे में उन्होंने खुद के पैसों और अहिल्याबाई की थोड़ी मदद से मंदिर का निर्माण कराया. लेकिन जब मंदिर का नाम रखने का समय आया तो रत्नाबाई ने इसे अपना नाम देना चाहा, लेकिन अहिल्याबाई इसके खिलाफ थीं. इसके बावजूद रानी के खिलाफ जाते हुए रत्नाबाई ने मंदिर का नाम 'रत्नेश्वर महादेव' रख दिया. जब अहिल्याबाई को इस बात का पता चला तो उन्होंने क्रोधित होकर इसे श्राप दे दिया, जिससे मंदिर टेढ़ा हो गया. एक अन्य कथा के अनुसार एक संत ने बनारस के राजा से इस मंदिर की देखभाल की जिम्मेदारी मांगी. लेकिन राजा ने संत को देखभाल की जिम्मेदारी देने से मना कर दिया. राजा की इस बात से संत नाराज हो गए और श्राप दिया कि यह मंदिर कभी भी पूजा के योग्य नहीं रहेगा. यह भी पढ़ें:-