Temple Facts: मंदिर में भगवान की प्रतिमा देखते ही मन में श्रद्धा और भक्ति का भाव जागता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि किसी मंदिर में मूर्ति को स्थापित करने से पहले विशेष पूजा और अनुष्ठान क्यों किए जाते हैं? हिंदू धर्म में केवल मूर्ति को मंदिर में रख देना ही स्थापना नहीं मानी जाती। प्रतिमा को विधि-विधान के साथ स्थापित करने के लिए प्राण प्रतिष्ठा संस्कार किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस प्रक्रिया के बाद ही प्रतिमा को देवस्वरूप मानकर नियमित पूजा-अर्चना की जाती है। आखिर क्या होती है प्राण प्रतिष्ठा और इसमें कौन-कौन सी धार्मिक विधियां की जाती हैं? आइए जानते हैं...
क्या होती है प्राण प्रतिष्ठा
प्राण प्रतिष्ठा हिंदू धार्मिक परंपरा में प्रतिमा स्थापना से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संस्कार है। ‘प्राण प्रतिष्ठा’ का सामान्य अर्थ है किसी प्रतिमा में देवत्व की प्रतिष्ठा करना। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंदिर में स्थापित की जाने वाली प्रतिमा को पहले शुद्ध और संस्कारित किया जाता है, इसके बाद मंत्रों और पूजा विधियों के माध्यम से उसमें देवता के चैतन्य स्वरूप का आवाहन किया जाता है। इसी कारण मंदिर में नई प्रतिमा की स्थापना केवल एक सामान्य धार्मिक कार्यक्रम नहीं होती, बल्कि इसे विशेष अनुष्ठान के रूप में संपन्न किया जाता है।
क्यों जरूरी मानी जाती है प्राण प्रतिष्ठा
धार्मिक परंपरा में मूर्ति को भगवान के ध्यान और उपासना का साकार माध्यम माना गया है। शिल्प और निर्माण के बाद प्रतिमा को मंदिर में स्थापित करने से पहले कई संस्कार किए जाते हैं। प्राण प्रतिष्ठा के माध्यम से देवता का आवाहन और प्रतिमा को पूजा के योग्य बनाने की धार्मिक प्रक्रिया पूरी की जाती है। मान्यता है कि प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रतिमा केवल पत्थर, धातु या किसी अन्य पदार्थ से बनी आकृति नहीं रहती, बल्कि उसे देवस्वरूप मानकर पूजा जाता है। इसके बाद मंदिर में भगवान की दैनिक पूजा, आरती, भोग और अन्य धार्मिक सेवाएं शुरू की जाती हैं।
प्रतिमा की होती है शुद्धि
प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया में सबसे पहले प्रतिमा और पूजा स्थल की शुद्धि की जाती है। इसके लिए अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के अनुसार जल, मंत्र और विभिन्न पूजन सामग्री का प्रयोग किया जाता है। मंदिर परिसर की भी शुद्धि की जाती है। पूजा के लिए कलश स्थापित किए जाते हैं और वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। इसका उद्देश्य धार्मिक विधि के अनुसार पूरे वातावरण को पूजा और अनुष्ठान के लिए तैयार करना होता है।
कलश स्थापना और देवताओं का आवाहन
प्राण प्रतिष्ठा के दौरान कलश स्थापना का भी विशेष महत्व माना जाता है। कलश में पवित्र जल के साथ निर्धारित पूजा सामग्री रखी जाती है और मंत्रों के साथ विभिन्न देव शक्तियों का आवाहन किया जाता है। इसके बाद मुख्य देवता की पूजा शुरू होती है। आचार्य या पुरोहित धार्मिक ग्रंथों और परंपरा में बताए गए मंत्रों के अनुसार अनुष्ठान संपन्न कराते हैं। अलग-अलग संप्रदाय और मंदिर परंपरा के अनुसार इस विधि में कुछ अंतर भी हो सकता है।
प्रतिमा का अभिषेक
प्राण प्रतिष्ठा से पहले या इसके दौरान प्रतिमा का अभिषेक किया जाता है। इसमें जल, दूध, दही, घी, शहद और अन्य पूजन सामग्री का प्रयोग परंपरा के अनुसार किया जा सकता है। इसे पंचामृत स्नान भी कहा जाता है। अभिषेक के बाद प्रतिमा को स्वच्छ वस्त्र पहनाए जाते हैं और आभूषणों तथा अन्य पूजन सामग्री से सजाया जाता है। इसके बाद भगवान को निर्धारित विधि से मंदिर में स्थापित किया जाता है।
मंत्रों से होता है देवता का आवाहन
प्राण प्रतिष्ठा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मंत्रोच्चार और देवता का आवाहन माना जाता है। पुरोहित विशेष मंत्रों के माध्यम से संबंधित देवी-देवता का आवाहन करते हैं। धार्मिक परंपरा में इसे प्रतिमा में देवत्व की प्रतिष्ठा से जुड़ी मुख्य प्रक्रिया माना गया है। इस दौरान न्यास आदि धार्मिक विधियां भी की जा सकती हैं। इनके माध्यम से मंत्रों के अनुसार प्रतिमा के विभिन्न अंगों में देव शक्ति की प्रतिष्ठा की जाती है।
नेत्रोन्मीलन की विशेष विधि
कई मंदिर परंपराओं में प्राण प्रतिष्ठा के दौरान नेत्रोन्मीलन संस्कार भी किया जाता है। इसका संबंध प्रतिमा के नेत्रों को धार्मिक विधि से खोलने से है। आमतौर पर प्रतिमा की आंखों को अंतिम चरण तक ढका रखा जाता है और विशेष मंत्रों के साथ यह विधि संपन्न की जाती है। धार्मिक मान्यता में नेत्रोन्मीलन को प्रतिमा स्थापना की महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना जाता है। इसके बाद भगवान के दर्शन और पूजा की विधि आगे बढ़ाई जाती है।
भगवान को लगाया जाता है भोग
प्राण प्रतिष्ठा के बाद भगवान की पूजा-अर्चना की जाती है और उन्हें भोग अर्पित किया जाता है। इसके साथ आरती, पुष्प अर्पण, धूप-दीप और अन्य धार्मिक विधियां पूरी की जाती हैं। कई मंदिरों में प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर विशेष हवन और यज्ञ भी आयोजित किए जाते हैं। यज्ञ में वैदिक मंत्रों के साथ आहुति दी जाती है। मंदिर की परंपरा के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान की अवधि एक दिन से लेकर कई दिनों तक हो सकती है।
प्राण प्रतिष्ठा के बाद शुरू होती है नियमित पूजा
प्राण प्रतिष्ठा पूरी होने के बाद मंदिर में नियमित पूजा-पद्धति शुरू की जाती है। भगवान को प्रतिदिन स्नान, वस्त्र, श्रृंगार, भोग और आरती जैसी सेवाएं अर्पित की जाती हैं। मंदिर की परंपरा के अनुसार सुबह और शाम की पूजा के साथ विशेष पर्वों पर अलग-अलग अनुष्ठान भी किए जाते हैं। इसी वजह से किसी नए मंदिर में मूर्ति स्थापना से पहले प्राण प्रतिष्ठा को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह प्रतिमा को मंदिर की नियमित उपासना व्यवस्था से जोड़ने वाला प्रमुख संस्कार है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)