Puja Tips: मंदिर में प्रवेश करते ही श्रद्धालु सबसे पहले भगवान के दर्शन करते हैं और फिर पूजा-पाठ की प्रक्रिया आगे बढ़ाते हैं। आपने अक्सर देखा होगा कि कई मंदिरों में भक्त भगवान के दर्शन करते समय दाईं ओर से आगे बढ़ते हैं। यह केवल मंदिर की व्यवस्था या लोगों की सुविधा के लिए नहीं माना जाता, बल्कि इसके पीछे सनातन धर्म से जुड़ी एक खास धार्मिक मान्यता भी बताई गई है। हिंदू धर्म में पूजा के दौरान दिशा और स्थान का विशेष महत्व माना गया है। ऐसे में क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान के दर्शन की शुरुआत दाईं ओर से ही क्यों की जाती है? क्या इसके पीछे कोई धार्मिक कारण है? आइए जानते हैं इस परंपरा से जुड़ी मान्यता।
दाईं ओर से शुरुआत की परंपरा
सनातन धर्म में दाईं दिशा को शुभ माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दाहिनी ओर से किसी शुभ कार्य की शुरुआत करना सकारात्मक माना जाता है। इसी वजह से मंदिर में भगवान के दर्शन करते समय भी भक्तों के दाईं ओर से आगे बढ़ने की परंपरा कई स्थानों पर देखने को मिलती है। हिंदू धार्मिक परंपराओं में दाहिनी दिशा को ‘दक्षिण’ कहा जाता है और भगवान की पूजा से जुड़े कई शुभ कार्यों में दाहिने हाथ और दाहिनी दिशा को विशेष महत्व दिया गया है। पूजा में संकल्प लेना हो, आचमन करना हो या किसी देवी-देवता को वस्तु अर्पित करनी हो, कई धार्मिक विधियों में दाहिने हाथ का प्रयोग किया जाता है।
भगवान की परिक्रमा से जुड़ा नियम
मंदिर में दाईं ओर से दर्शन करने की परंपरा को भगवान की परिक्रमा से भी जोड़कर देखा जाता है। हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की परिक्रमा करते समय सामान्य रूप से भगवान को अपने दाईं ओर रखा जाता है। इसे प्रदक्षिणा कहा जाता है। ‘प्रदक्षिणा’ का अर्थ ही है भगवान को अपने दाहिने ओर रखते हुए उनके चारों ओर घूमना। धार्मिक मान्यता है कि इस प्रकार भगवान को केंद्र में रखकर उनकी परिक्रमा करने से श्रद्धालु स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित करता है। इसी धार्मिक भावना के कारण मंदिर में दर्शन और परिक्रमा की व्यवस्था में दाईं दिशा का महत्व दिखाई देता है।
दाईं दिशा को क्यों माना गया शुभ?
धार्मिक मान्यताओं में दाहिना पक्ष शुभता और मंगल से जुड़ा माना जाता है। पूजा-पाठ के दौरान कई ऐसे नियम हैं जिनमें दाहिने हाथ या दाहिनी दिशा का प्रयोग करने की परंपरा रही है। माना जाता है कि दाईं ओर से आगे बढ़ना शुभ कार्य की सकारात्मक शुरुआत का प्रतीक है। मंदिर में जब भक्त भगवान के सामने पहुंचता है तो उसका उद्देश्य केवल दर्शन करना नहीं, बल्कि अपने मन को ईश्वर के प्रति एकाग्र करना भी होता है। दाईं ओर से दर्शन करने की परंपरा इसी धार्मिक अनुशासन का हिस्सा मानी जाती है।
प्रदक्षिणा में भी भगवान दाईं ओर
मंदिरों में भगवान की परिक्रमा करते समय भी एक खास नियम का पालन किया जाता है। भक्त भगवान को अपने दाईं ओर रखते हुए घड़ी की दिशा में परिक्रमा करता है। इसे प्रदक्षिणा या परिक्रमा कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान को दाईं ओर रखकर परिक्रमा करना उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करने का तरीका है। यही वजह है कि मंदिरों में दर्शन की व्यवस्था और परिक्रमा की दिशा में भी दाईं ओर का महत्व दिखाई देता है।
भगवान को दाईं ओर रखना शुभ क्यों?
सनातन परंपरा में किसी पूज्य व्यक्ति या देवता को अपने दाईं ओर रखना सम्मान का प्रतीक माना गया है। इसी भाव के साथ भगवान की प्रदक्षिणा में भी उन्हें दाईं ओर रखा जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह भक्त के मन में भगवान को सर्वोच्च स्थान देने की भावना को दर्शाता है, इसलिए मंदिर में दाईं ओर से दर्शन शुरू करने की परंपरा को शुभता, सम्मान और भगवान के प्रति समर्पण की धार्मिक भावना से जोड़कर देखा जाता है। यह सदियों से चली आ रही उन परंपराओं में से एक है, जिनमें पूजा के साथ दिशा और विधि का भी विशेष महत्व बताया गया है।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)