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Temple: मंदिर में मिलने वाले चरणामृत को क्यों माना जाता है अमृत? जानें इसका रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Temple Facts: पद्म पुराण और स्कंद पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में चरणामृत की महिमा का वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार भगवान के चरणों का स्पर्श करने वाला जल पापों का नाश करने वाला और मन को शुद्ध करने वाला माना गया है।

Temple Facts
Temple Facts: मंदिर में प्रसाद और चरणामृत को लेकर हिंदू धर्म में विशेष आस्था जुड़ी हुई है। माना जाता है कि भगवान को अर्पित होने के बाद यह केवल भोजन या जल नहीं रह जाता, बल्कि दिव्य कृपा का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि मंदिरों में मिलने वाले चरणामृत को श्रद्धालु अत्यंत पवित्र मानते हैं। कई लोग इसे अमृत के समान मानकर ग्रहण करते हैं। शास्त्रों में भी चरणामृत की महिमा का उल्लेख मिलता है, जहां इसे शरीर और मन दोनों को पवित्र करने वाला माना गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चरणामृत वह पवित्र जल होता है जिससे भगवान के चरणों का अभिषेक किया जाता है। इसके बाद उसमें तुलसी दल, गंगाजल, दूध, दही, शहद और घी जैसे पवित्र पदार्थ मिलाए जाते हैं। यही कारण है कि इसे केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि ईश्वर के आशीर्वाद का स्वरूप माना जाता है।

क्या होता है चरणामृत?

‘चरणामृत’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘चरण’ अर्थात भगवान के पांव और ‘अमृत’ अर्थात अमरत्व प्रदान करने वाला पवित्र तत्व। मंदिरों में भगवान के विग्रह का अभिषेक करने के बाद जो जल एकत्र किया जाता है, वही चरणामृत कहलाता है। इसे भक्त दोनों हाथों से ग्रहण कर श्रद्धा के साथ पीते हैं। वैष्णव परंपरा में इसे ‘चरनामृत’ और कुछ स्थानों पर ‘पादोदक’ भी कहा जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान के चरणों का स्पर्श करने वाला जल दिव्य गुणों से युक्त हो जाता है।

शास्त्रों में चरणामृत को अमृत क्यों कहा गया?

पद्म पुराण और स्कंद पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में चरणामृत की महिमा का वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार भगवान के चरणों का स्पर्श करने वाला जल पापों का नाश करने वाला और मन को शुद्ध करने वाला माना गया है।

एक प्रचलित श्लोक है:-

अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णो पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥

इसका अर्थ है कि भगवान विष्णु के चरणों का पवित्र जल अकाल मृत्यु और रोगों से रक्षा करने वाला माना गया है। इसी कारण इसे अमृत की उपमा दी गई है।

तुलसी और गंगाजल से बढ़ती है पवित्रता

चरणामृत में तुलसी दल का प्रयोग विशेष रूप से किया जाता है। हिंदू धर्म में तुलसी को अत्यंत पवित्र माना गया है और इसे भगवान विष्णु की प्रिय माना जाता है। जब तुलसी चरणामृत में मिलती है तो उसका धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। इसी तरह कई मंदिरों में गंगाजल भी मिलाया जाता है। गंगा को स्वयं देवी का स्वरूप माना गया है, इसलिए गंगाजल और तुलसी युक्त चरणामृत को विशेष रूप से पुण्यदायक माना जाता है।

समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा अमृत का प्रतीक

धार्मिक कथाओं में बताया जाता है कि समुद्र मंथन से निकले अमृत ने देवताओं को अमरत्व प्रदान किया था। उसी प्रकार चरणामृत को आध्यात्मिक अमृत माना गया है, जो आत्मा को शुद्ध करता है और भगवान के प्रति भक्ति को मजबूत करता है। यही कारण है कि भक्त इसे केवल जल नहीं, बल्कि दिव्य कृपा का प्रसाद मानते हैं।

मंदिरों में चरणामृत ग्रहण करने की परंपरा

अधिकांश मंदिरों में पूजा और आरती के बाद चरणामृत वितरित किया जाता है। इसे ग्रहण करने का पारंपरिक तरीका भी बताया गया है- दोनों हाथों को जोड़कर चरणामृत लेना। पहले उसे मस्तक से लगाना। फिर श्रद्धा के साथ पीना। मान्यता है कि ऐसा करने से भक्त भगवान के चरणों का सम्मान करता है और उनकी कृपा प्राप्त करता है।

चरणामृत को सबसे पहले क्यों ग्रहण कराया जाता है?

कई मंदिरों में प्रसाद से पहले चरणामृत दिया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि भगवान के चरणों का पवित्र जल ग्रहण करने के बाद भक्त पूजा के पूर्ण फल का अधिकारी बनता है। यह भक्ति, समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)
 

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