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Maa Tarkulha Devi Shakti Peeth: तरकुलहा देवी मंदिर, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश... बलिदानी इतिहास का है प्रतीक

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Tarkulha Devi Temple: भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में गोरखपुर जनपद की चौरी-चौरा तहसील के पास स्थित मां तरकुलहा देवी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह अटूट आस्था, बलिदानी इतिहास और अदम्य साहस का प्रतीक है। 

Maa Tarkulha Devi Shaktipeeth Mandir
Maa Tarkulha Devi Mandir: तरकुलहा देवी मंदिर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी चौरा क्षेत्र में स्थित एक अत्यंत प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर है, जो लगभग 200 वर्ष पुराना है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू बंधू सिंह से जुड़ा यह मंदिर अपनी अनूठी परंपरा, जैसे कि मां को प्रसाद के रूप में मटन (हांडी मीट) चढ़ाना और मुख्य रूप से नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के लिए जाना जाता है। 

भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में गोरखपुर जनपद की चौरी-चौरा तहसील के पास स्थित मां तरकुलहा देवी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह अटूट आस्था, बलिदानी इतिहास और अदम्य साहस का प्रतीक है। घने जंगलों के बीच बसा यह मंदिर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की यादों को आज भी संजोए हुए है।

मंदिर की भौगोलिक स्थिति और नामकरण

गोरखपुर से लगभग 22 किलोमीटर दूर देवीपुर गांव में स्थित यह मंदिर तरकुल (ताड़) के वृक्षों के झुरमुट के बीच स्थित है। प्राचीन काल में यहां ताड़ के पेड़ों की अधिकता थी। मान्यता है कि यहां देवी की प्रतिमा एक ताड़ (तरकुल) के पेड़ के नीचे प्रतिष्ठित थी, जिसके कारण इनका नाम 'तरकुलहा देवी' पड़ा। आज भी मंदिर परिसर का प्राकृतिक सौंदर्य और शांति भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
 
क्रांतिकारी इतिहास चमत्कार और शहादत
  • तरकुलहा देवी मंदिर का इतिहास महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू बंधु सिंह के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। बंधु सिंह गोरखपुर जिले के डुमरी रियासत के जमींदार थे और मां तरकुलहा के अनन्य भक्त थे। 
  • 1857 के विद्रोह के समय, बंधु सिंह ने जंगलों को अपना आधार बनाया। वे मां के चरणों में प्रतिज्ञा कर चुके थे कि वे देश को आजाद कराने के लिए संघर्ष करेंगे। 
  • लोककथाओं के अनुसार, बंधु सिंह गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) के माध्यम से अंग्रेज सैनिकों पर हमला करते थे और उनका वध कर मां तरकुलहा के चरणों में उनकी बलि चढ़ाते थे। यह स्थान क्रांतिकारियों के लिए शक्ति और प्रेरणा का केंद्र बन गया था।
  • कहा जाता है कि जब अंग्रेजों ने विश्वासघात के जरिए बंधु सिंह को गिरफ्तार किया, तो उन्हें गोरखपुर के 'अलीनगर' चौराहे पर सरेआम फांसी देने की तैयारी की गई। 12 अगस्त 1858 का वह दिन इतिहास में दर्ज है।
  • जनश्रुति है कि जब जल्लाद ने बंधु सिंह को फांसी देने के लिए फंदा खींचा, तो वह टूट गया। ऐसा एक बार नहीं, बल्कि सात बार हुआ। अंग्रेज अफसर दंग रह गए। तब बंधु सिंह ने स्वयं मां तरकुलहा का ध्यान किया और उनसे प्रार्थना की कि वे उन्हें अपनी शरण में ले लें ताकि उनकी शहादत सफल हो सके। 
  • आठवीं बार में फंदा नहीं टूटा और बंधु सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। जिस क्षण उनकी आत्मा देह से अलग हुई, कहा जाता है कि मंदिर के पास स्थित तरकुल का पेड़ टूट गया और वहां से रक्त की धारा बह निकली थी।

मंदिर की अनूठी परंपरा

तरकुलहा देवी मंदिर अपनी एक विशिष्ट परंपरा के लिए पूरे उत्तर भारत में विख्यात है। यहां मन्नत पूरी होने पर भक्त बकरे की बलि देते हैं। इस बलि के मांस को मंदिर परिसर के पास ही मिट्टी की हांडियों में लकड़ी की आग पर पकाया जाता है। इस प्रसाद को बनाने में विशेष रूप से लोहे के बर्तनों का प्रयोग वर्जित माना जाता है। यहां का 'हांडी मटन' न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी विशिष्ट स्वाद शैली के लिए भी जाना जाता है। इस प्रसाद को भक्त अपने परिवार और इष्ट मित्रों के साथ वहीं ग्रहण करते हैं।

चैत्र नवरात्रि का विशाल मेला

यहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन चैत्र नवरात्रि (मार्च-अप्रैल) के दौरान यहां का नजारा अलौकिक होता है। इस अवसर पर यहां एक महीने का विशाल मेला लगता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर परिसर 'जय माता दी' के जयकारों और घंटियों की गूंज से सराबोर रहता है। लोग अपनी मन्नतें मांगने के लिए मंदिर की जाली पर कलावा (रक्षासूत्र) और पीतल की घंटियां बांधते हैं।

विशेषताएं और परंपराएं

प्रसाद की अनोखी परंपरा घंटी बांधने का रिवाज चैत्र रामनवमी मेला
यहां मन्नत पूरी होने पर बकरे की बलि दी जाती है और मांस को मिट्टी की हांडियों (हांडी मटन) में पकाकर बाटी के साथ प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर मंदिर परिसर में घंटी बांधते हैं। हर साल चैत्र नवरात्रि से शुरू होकर यहां लगभग एक महीने तक चलने वाला विशाल मेला लगता है। 

वर्तमान स्वरूप और पर्यटन

आज के समय में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस स्थान को एक प्रमुख पर्यटन और धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया है। यहां भक्तों के ठहरने के लिए धर्मशालाएं, बैठने के लिए पार्क और शहीद बंधु सिंह की स्मृति में एक भव्य स्मारक भी बनाया गया है। मंदिर का गर्भगृह छोटा लेकिन अत्यंत ऊर्जावान है, जहां माता की पिंडी के दर्शन मात्र से शांति मिलती है।

कैसे पहुंचें मां तरकुलहा मंदिर?

सड़क मार्ग रेल मार्ग हवाई मार्ग
गोरखपुर जंक्शन या देवरिया से बस, टैक्सी या निजी वाहन द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। निकटतम रेलवे स्टेशन चौरी-चौरा है, जो मंदिर से लगभग 5 किमी की दूरी पर है। गोरखपुर हवाई अड्डा (GOP) सबसे नज़दीकी एयरपोर्ट है।

मां तरकुलहा देवी मंदिर का महत्व

मां तरकुलहा देवी मंदिर हमें यह सिखाता है कि धर्म और राष्ट्र सेवा अलग-अलग नहीं हैं। यह स्थान हमें याद दिलाता है कि कैसे एक भक्त ने अपनी आस्था को देश की आजादी का हथियार बनाया। यहां आने वाला हर व्यक्ति केवल आशीर्वाद ही नहीं ले जाता, बल्कि अपने साथ उस महान क्रांतिकारी की वीरता की कहानियां भी लेकर जाता है जिसने भारत माता के चरणों में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

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