Ramayana: वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा जनक और रानी सुनयना को दो पुत्रियां प्राप्त हुईं, पहली सीता माता, जो धरती की पुत्री मानी जाती हैं। दूसरी पुत्री थीं- उर्मिला, जो लक्ष्मण की पत्नी बनीं।
Ramayana Mythological Story: भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में श्रीरामकथा का जो स्थान है, वह अनुपम है। वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी के श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की लीलाओं का वर्णन तो विस्तार से मिलता है, परन्तु इनके पीछे जो त्यागमयी नारियां खड़ी थीं, उनकी चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है। ऐसी ही एक पावन चरित्र हैं- लक्ष्मण जी की पत्नी उर्मिला। जो न केवल मिथिला नरेश जनक जी की पुत्री और माता सीता की छोटी बहन थीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के शेषनाग की पत्नी नाग-लक्ष्मी का अवतार भी मानी जाती हैं।
उर्मिला, रामायण की एक ऐसी पात्र हैं, जिनका नाम लेते ही मन श्रद्धा से झुक जाता है। वह लक्ष्मण की पत्नी थीं, सीता की छोटी बहन थीं, जनक दुलारी की दूसरी पुत्री थीं और मिथिला नरेश जनक- सुनयना की छोटी बेटी मानी जाती हैं परंतु इन सबसे ऊपर वह एक ऐसी स्त्री थीं, जिन्होंने अपना सारा सुख, अपनी सारी नींद, अपना सारा जीवन राम-लक्ष्मण की सेवा और राक्षसों के विनाश के लिए समर्पित कर दिया। ऐसे में चलिए जानते हैं कि कौन थीं उर्मिला और पूर्व जन्म में वे किसका अवतार थीं....
रामायण में उर्मिला कौन थीं?
वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा जनक और रानी सुनयना को दो पुत्रियां प्राप्त हुईं, पहली सीता माता, जो धरती की पुत्री मानी जाती हैं। दूसरी पुत्री थीं- उर्मिला, जो लक्ष्मण की पत्नी बनीं। इसके साथ ही रामायण में मांडवी और श्रुतकीर्ति की भी महत्वपूर्ण भूमिका है, जो भरत और शत्रुघ्न की पत्नी थीं। ये दोनों राजा जनक के भाई कुशध्वज और उनकी पत्नी चंद्रभागा की पुत्रियां थीं। ये दोनों भगवान राम की पत्नी सीता और लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की चचेरी बहनें थीं।
जब भगवान श्रीराम का विवाह माता सीता के साथ हुआ, तो उसी समय उनके तीनों अनुज भाइयों का विवाह भी जनक की अन्य पुत्रियों से सम्पन्न हुआ। लक्ष्मण जी का विवाह उर्मिला से हुआ। विवाह के पश्चात् जब चौदह वर्ष का वनवास प्राप्त हुआ और श्रीराम-सीता-लक्ष्मण वन को प्रस्थान करने लगे, तब लक्ष्मण जी ने अपनी नवविवाहिता पत्नी उर्मिला से आज्ञा ली। उर्मिला ने लक्ष्मण से कहा- स्वामी, आप श्रीराम की सेवा में जा रहे हैं, यह आपका परम कर्तव्य है। मैं आपकी कोई बाधा नहीं बनूंगी।
किसका अवतार थीं उर्मिला
पुराणों और रामायण की आध्यात्मिक व्याख्याओं में स्पष्ट उल्लेख है कि जब भगवान विष्णु सत्ययुग में श्रीराम के रूप में अवतरित हुए, तब उनके सहस्त्र फणों वाले अनंत शेषनाग भी लक्ष्मण के रूप में अवतरित हुए। शेषनाग तो सदा भगवान के साथ रहते हैं, इसलिए लक्ष्मण जी ने श्रीराम की सेवा में एक क्षण के लिए भी विश्राम नहीं किया।
परन्तु शेषनाग की पत्नी कौन हैं? पुराणों में कहा गया है कि शेषनाग की पत्नी नाग-लक्ष्मी (या नागवल्लरी) हैं। जब भगवान विष्णु धरती पर सातवें अवतार श्रीराम के रूप में आए, तब शेषनाग लक्ष्मण बने और उनकी पत्नी नाग-लक्ष्मी ने उर्मिला के रूप में जन्म लिया। यह बात पद्मपुराण, विष्णुपुराण तथा कुछ रामायण की टीकाओं में स्पष्ट रूप से वर्णित है, इसलिए उर्मिला को नाग-लक्ष्मी का अवतार माना जाता है।
रामायण में उर्मिला की त्याग की कथा
जिस रात श्रीराम को वनवास का आदेश मिला और वे कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी सबको प्रणाम करके अपने महल लौटे, उसी रात लक्ष्मण भी अपनी पत्नी उर्मिला के पास गए। उर्मिला उस समय दीपक जला कर आरती की थाली सजा रही थीं। लक्ष्मण ने गंभीर स्वर में कहा- प्रिये, भैया श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला है। मैं उनके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता। मैं उनके साथ वन जा रहा हूं। उर्मिला ने मुस्कुरा कर कहा- स्वामी, यह तो मेरे भाग्य हैं। मैं भी आपके साथ चलूंगी। अभी सामान बांधती हूं।
लक्ष्मण ने हाथ पकड़ कर रोका और कहा- नहीं उर्मिला, यह यात्रा अत्यंत कठिन है। रात-दिन जागरण, राक्षसों से युद्ध, भूख-प्यास, विषम परिस्थितियां होंगी। सीता भाभी तो भैया के बिना जीवित नहीं रह सकतीं, इसलिए वे जा रही हैं। किंतु मेरे साथ तुम्हारा जाना संभव नहीं। मैं चौदह वर्ष तक एक रात भी सोने न पाऊं, यह संकल्प ले चुका हूं। दिन में भैया-भाभी की सेवा, रात में पहरा। तुम यह कष्ट नहीं सह सकोगी। उर्मिला ने आंसुओं को रोकते हुए कहा- आर्य, मैं आपके बिना कैसे जीवित रहूंगी?
लक्ष्मण ने कसम खाई थी कि वह भगवान राम और माता सीता की उनके 14 साल के वनवास के दौरान हर तरह से मदद करेंगे और यह सूनिश्चित करेंगे कि उन्हें कोई मुश्किल न हो। अगर उनकी पत्नी उर्मिला उनके साथ जातीं तो लक्ष्मण की जिम्मेदारी बढ़ जाती और वह भगवान राम और माता सीता की उतनी अच्छी तरह सेवा नहीं कर पाते जितना वह कर सकते थे।
लक्ष्मण ने लिया उर्मिला से वचन
कैकेयी के वर स्वरुप भरत को अयोध्या का राजा घोषित किया जा चुका था व राम को देश निकाला दिया गया था, जिसका बुरा प्रभाव उनकी मां कौशल्या व पिता दशरथ पर पड़ा था। अपने पुत्र से 14 वर्षों तक दूर रहने की पीड़ा सहन करने की क्षमता उनमे कम ही थी व यदि उर्मिला भी राम, लक्षमण व माता सीता के साथ वहां से चली जाती तो राजमहल सूना हो जाता व माता कौशल्या व दशरथ का ध्यान रखने वाला कोई ना होता, इसलिए लक्ष्मण ने उर्मिला से वचन लिया कि वे स्वयं 14 वर्षों तक वन में रहकर भगवान श्रीराम व माता सीता की सेवा करेंगे व उर्मिला राजमहल में रहकर माता कौशल्या व राजा दशरथ की सेवा करेंगी। यही कठोर वचन लेकर लक्ष्मण अपने भाई व भाभी के साथ वन में चले गए।
लक्ष्मण को मिली उर्मिला की नींद
वन में जब राम और सीता कुटिया में विश्राम करते थे, तब लक्ष्मण बाहर पहरा देते थे। एक रात निद्रा देवी उनके समक्ष प्रकट हुईं। लक्ष्मण ने उनसे वर मांगा कि चौदह वर्ष तक मुझे निद्रा न आए, ताकि मैं निरंतर भाई-भाभी की रक्षा कर सकूं। निद्रा देवी ने वर दे दिया, किंतु शर्त रखी कि उनकी नींद का हिस्सा कोई और लेगा। लक्ष्मण ने प्रार्थना की कि वह नींद उनकी पत्नी उर्मिला को दे दी जाए। इसी कारण चौदह वर्ष तक लक्ष्मण एक क्षण को भी नहीं सोए और उर्मिला गहन निद्रा में रहीं।
माता सीता ने उर्मिला को अपना एक विशेष वरदान दे दिया था, जिसके प्रभाव से उर्मिला एक साथ तीन कार्य कर सकती थीं- सोना, परिवार की सेवा करना और अपने पातिव्रत्य की रक्षा करना, इसलिए शरीर से सोते हुए भी वे अपने कर्तव्यों का पूर्ण निर्वाह करती रहीं।
(इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)