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Pitru Paksha Day 6: पितृपक्ष के छठवें दिन किन लोगों का होता है तर्पण और पिंडदान, जानिए क्या नियम और महत्व

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Shradh Rules: मनुष्य पर अपने पूर्वजों के प्रति भी कुछ दायित्व होते हैं। पितृपक्ष इन दायित्वों को श्रद्धा के साथ निभाने का अवसर माना जाता है। 
 

Shradh Rules
Pitru Paksha Shashti Tithi: पितृपक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति और उनके आशीर्वाद की कामना से श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। पितृपक्ष के हर दिन का संबंध अलग-अलग तिथि पर दिवंगत हुए पितरों से माना जाता है। इसी क्रम में पितृपक्ष की षष्ठी तिथि यानी छठवें दिन भी श्राद्ध कर्म करने का विशेष महत्व बताया गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष की षष्ठी तिथि को उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन हिंदू पंचांग की षष्ठी तिथि को हुआ हो। यानी यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी या परिवार के किसी अन्य सदस्य का देहांत षष्ठी तिथि को हुआ था, तो उनके लिए इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है।

जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि ठीक से याद नहीं है, उनके लिए अलग श्राद्ध तिथियों और विशेष श्राद्ध के नियम बताए गए हैं। ऐसी स्थिति में परिवार की परंपरा और किसी विद्वान आचार्य की सलाह के अनुसार श्राद्ध कर्म करना उचित माना जाता है।

तर्पण और पिंडदान का महत्व 

पितृपक्ष में तर्पण का अर्थ जल, तिल आदि के माध्यम से पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करना है। मान्यता है कि तर्पण करने से व्यक्ति अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है और उनकी आत्मिक शांति की कामना करता है। वहीं पिंडदान में चावल, तिल और अन्य सामग्री से पिंड बनाकर पितरों को समर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में पिंडदान को पितरों के प्रति सम्मान और उनके प्रति अपने कर्तव्य को पूरा करने का माध्यम माना गया है। इससे परिवार में सुख-शांति और पितरों के आशीर्वाद की कामना की जाती है।

छठवें दिन श्राद्ध के नियम 

षष्ठी तिथि के श्राद्ध में घर की साफ-सफाई करके श्रद्धा और विधि-विधान से पितरों का स्मरण किया जाता है। स्नान के बाद पितरों का ध्यान करके तर्पण किया जाता है। इसके बाद ब्राह्मण भोजन और यथाशक्ति दान करने की परंपरा है। श्राद्ध कर्म में सात्विक भोजन का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन भोजन में पितरों को प्रिय माने जाने वाले सात्विक पकवान बनाए जाते हैं और भोजन कराने के बाद दक्षिणा तथा दान दिया जाता है। श्राद्ध कर्म करते समय मन में श्रद्धा रखना सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।

पितृपक्ष में क्यों किया जाता है श्राद्ध?

हिंदू धर्म में माना जाता है कि मनुष्य पर अपने पूर्वजों के प्रति भी कुछ दायित्व होते हैं। पितृपक्ष इन दायित्वों को श्रद्धा के साथ निभाने का अवसर माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पितरों को याद करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस प्रकार पितृपक्ष के छठवें दिन षष्ठी तिथि को दिवंगत हुए पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। श्राद्ध कर्म में दिखावे के बजाय श्रद्धा, शुद्ध भाव और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य को अधिक महत्व दिया जाता है।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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