Pind Daan : पितृ पक्ष शुरू हो गया है जिसमें पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंड दान, श्राद्ध और तर्पण जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। ये अनुष्ठान हर साल आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होते हैं और सर्वपितृ अमावस्या को समाप्त होते हैं।
Pind Daan : पितृ पक्ष शुरू हो गया है जिसमें पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंड दान, श्राद्ध और तर्पण जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। ये अनुष्ठान हर साल आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होते हैं और सर्वपितृ अमावस्या को समाप्त होते हैं। आम तौर पर पितृ पक्ष में मृत परिवार के सदस्यों के लिए पिंड दान किया जाता है लेकिन देश में एक अनोखा मंदिर है जहाँ जीवित लोग अपना पिंड दान खुद करते हैं। यही बात इस मंदिर को सचमुच खास बनाती है। यहाँ की परंपरा हज़ारों साल पुरानी है और आज भी उतनी ही गहरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है
अनोखा जनार्दन मंदिर
बिहार में स्थित इस अनोखे मंदिर को जनार्दन मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह गया के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है और भस्मकूट पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ भगवान विष्णु जनार्दन के रूप में विराजमान हैं। पितृ पक्ष के दौरान, मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ लोग मरने से पहले अपना पिंड दान खुद करते हैं।
स्वयं पिंड दान करने के कारण
जिन लोगों की कोई संतान नहीं है या जिनकी मृत्यु के बाद पिंड दान की रस्म निभाने के लिए परिवार का कोई सदस्य नहीं है वे गया के इस अनोखे मंदिर में जीवित रहते हुए ही यह रस्म खुद पूरी करने आते हैं। इसके अलावा जो लोग सांसारिक जीवन का त्याग कर देते हैं भले ही उनका परिवार हो वे भी अपना पिंड दान करने के लिए इस मंदिर में आते हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार यदि पिंड दान और तर्पण नहीं किया जाता है तो आत्मा भटकती रहती है और उसे शांति नहीं मिलती। माना जाता है कि गया के जनार्दन मंदिर में भगवान विष्णु स्वयं पिंड स्वीकार करते हैं और यहाँ यह रस्म निभाने से आत्मा को मुक्ति मिलती है।
Trending Video
मृत्यु के बाद पिंडदान की ज़रूरत नहीं
गयाजी से जुड़ी एक अनोखी मान्यता यह है कि अगर कोई व्यक्ति जीवित रहते हुए ही अपना श्राद्ध और पिंडदान कर ले तो उसकी मृत्यु के बाद परिवार के सदस्यों को ये रस्में निभाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। ऐसा करने से सारे पितृ दोष खत्म हो जाते हैं। नतीजतन, मृत्यु के बाद आत्मा को यमलोक या अन्य लोकों में कष्ट नहीं भोगना पड़ता। गयाजी में पूर्वजों के पिंडदान के लिए लगभग 54 पिंड वेदी स्थल और 53 पवित्र स्थान हैं लेकिन जनार्दन मंदिर की वेदी दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ जीवित व्यक्ति अपना श्राद्ध खुद करता है। यह मंदिर माँ मंगला गौरी मंदिर के उत्तर में भस्मकूट पर्वत पर स्थित है।
तीन दिनों में पूरा होता है आत्म-श्राद्ध
आत्म-श्राद्ध की रस्म तीन दिनों में पूरी होती है। गयाजी के पवित्र स्थल पर पहुँचने के बाद व्यक्ति वैष्णव सिद्धि का संकल्प लेता है और अपने पिछले पापों के प्रायश्चित की कामना करता है। इसके बाद भगवान जनार्दन स्वामी के मंदिर में पूरी वैदिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा और मंत्र-जाप किया जाता है। फिर दही और चावल से बने तीन पिंड भगवान को अर्पित किए जाते हैं। इस रस्म की एक खास बात यह है कि इसमें तिल का इस्तेमाल नहीं किया जाता जबकि मृतकों के लिए किए जाने वाले श्राद्धमें तिल को ज़रूरी माना जाता है। पिंड अर्पित करते समय भक्त भगवान से प्रार्थना करता है "मैं जीवित रहते हुए ही अपने लिए ये पिंड अर्पित कर रहा हूँ जब मेरी आत्मा इस शरीर को छोड़े तो आपके आशीर्वाद से मुझे मोक्ष प्राप्त हो।" यह भी पढ़ें-
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)