Navgrah Mandir: सनातन धर्म में हर मंदिर की बनावट और उनमें देवी-देवताओं की स्थापना गहरे वैज्ञानिक ज्योतिषीय और आध्यात्मिक सिद्धांतों पर आधारित है।
Navgrah Mandir: सनातन धर्म में हर मंदिर की बनावट और उनमें देवी-देवताओं की स्थापना गहरे वैज्ञानिक ज्योतिषीय और आध्यात्मिक सिद्धांतों पर आधारित है। अगर आप अक्सर हिंदू मंदिरों में जाते हैं तो आपने एक आम बात देखी होगी ज़्यादातर बड़े शिव मंदिरों के आंगन में नवग्रहकी मूर्तियां होती हैं या उनके लिए एक खास नवग्रह मंडप बना होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वैष्णव मंदिरों यानी भगवान विष्णु, श्री राम या श्री कृष्ण को समर्पित मंदिरों में नवग्रह की मूर्तियां क्यों नहीं होतीं? आइए ज्योतिष,पुराणों और धर्मग्रंथों के नज़रिए से इस दिलचस्प रहस्य के मुख्य कारणों को जानें।
भगवान शिव: 'महाकाल' और ग्रहों के नियंत्रक
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव को 'महाकाल' के रूप में जाना जाता है। 'काल' का अर्थ है समय और समय की गणना सूर्य और चंद्रमा सहित सभी खगोलीय पिंडों की गति पर आधारित होती है।
ग्रहों के स्वामी:शिव पुराण के अनुसार, सूर्य, मंगल, शनि, राहु और केतु सहित सभी नौ ग्रह ब्रह्मांड में केवल भगवान शिव के आदेश से ही संचालित होते हैं।
शनि देव के गुरु: भगवान शनि ने स्वयं भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या करने के बाद 'न्यायाधीश' का पद प्राप्त किया। यही कारण है कि जो भक्त शिव की शरण में जाते हैं, उन पर ग्रहों का बुरा प्रभाव बेअसर हो जाता है। इसलिए शिव मंदिरों में नवग्रहों की उपस्थिति को ज़रूरी माना जाता है।
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वैष्णव परंपरा: 'अनन्य भक्ति' और समर्पण के सिद्धांत
वैष्णव संप्रदाय का पूरा दर्शन शरणागति और अनन्य भक्ति के सिद्धांतों पर टिका है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" जिसका अर्थ है "सभी अन्य आश्रयों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ।"
विष्णु ही सर्वोच्च हैं: वैष्णव परंपरा के अनुसार, यदि कोई भक्त भगवान विष्णु की शरण में पूरी तरह से समर्पित हो गया है, तो उसे किसी अन्य देवता या खगोलीय पिंड की अलग से पूजा करने की आवश्यकता नहीं है।
ग्रह भगवान की इच्छा के अनुसार चलते हैं: वैष्णव मानते हैं कि नवग्रह स्वयं नारायण के नियमों से बंधे हैं। जब ब्रह्मांड के पालनहार प्रसन्न होते हैं तो नवग्रह भक्त को कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकते। इसी अनन्य भक्ति की भावना को बनाए रखने के लिए वैष्णव मंदिरों के गर्भगृह या प्रांगण में नवग्रहों के लिए अलग से मंदिर नहीं बनाए जाते हैं।
क्या वैष्णव भक्त ग्रहों के प्रभाव से अछूते रहते हैं?
शास्त्रों के अनुसार ग्रहों का गोचर और प्रभाव हर इंसान पर पड़ता है हालाँकि इससे निपटने का तरीका दोनों मार्गों में अलग-अलग है। शैव परंपरा में, भक्त भगवान शिव के साथ-साथ उन ग्रहों की भी पूजा करता है जो उनके आदेश पर चलते हैं। वैष्णव परंपरा में भक्त का यह अटूट विश्वास होता है कि श्री हरि की कृपा से सभी अशुभ ग्रहों का प्रभाव अपने आप ही समाप्त हो जाएगा। यह सूक्ष्म आध्यात्मिक और सैद्धांतिक अंतर शैव और वैष्णव मंदिरों की अनूठी संरचनात्मक व्यवस्था में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह भी पढ़ें
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)