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Mantra Jap : ‘ॐ’ की ध्वनि क्यों मानी जाती है दिव्य? जानिए अनोखे तथ्य

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Mantra Jap :  जब भी आप किसी मंदिर, योग केंद्र या ध्यान करते हुए किसी साधक को “ॐ” का उच्चारण करते सुनते हैं, तो मन में एक प्रश्न जरूर उठता है  आखिर यह ध्वनि इतनी विशेष क्यों मानी जाती है?

Mantra Jap :
Mantra Jap :  जब भी आप किसी मंदिर, योग केंद्र या ध्यान करते हुए किसी साधक को “ॐ” का उच्चारण करते सुनते हैं, तो मन में एक प्रश्न जरूर उठता है  आखिर यह ध्वनि इतनी विशेष क्यों मानी जाती है?कहा जाता है कि बहुत प्राचीन समय में ऋषि-मुनि गहन ध्यान में लीन होकर सत्य की खोज करते थे। एक दिन ध्यान की गहरी अवस्था में उन्हें एक सूक्ष्म और रहस्यमयी ध्वनि सुनाई दी। यह आवाज किसी शंख, घंटी या बाहरी स्रोत से नहीं आ रही थी। फिर भी वह ध्वनि लगातार गूंज रही थी मानो पूरे ब्रह्मांड में एक अदृश्य कंपन फैल रहा हो।जैसे-जैसे उनका ध्यान और गहरा होता गया, वह ध्वनि और स्पष्ट सुनाई देने लगी। ऋषियों को लगा कि यह कोई साधारण ध्वनि नहीं, बल्कि सृष्टि की मूल ध्वनि है। उसी दिव्य अनुभव को उन्होंने “ॐ” या “ओम” नाम दिया।

ओम का गहरा रहस्य

हिंदू धर्म में ‘ऊं’ को केवल एक शब्द या ध्वनि नहीं माना गया, बल्कि इसे संपूर्ण ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक कहा गया है। मान्यता है कि जब यह ध्वनि गूंजती है, तो उसके कंपन से केवल वातावरण ही नहीं, बल्कि मन, शरीर और आत्मा भी प्रभावित होते हैं।कहा जाता है कि ‘ऊं’ तीन ध्वनियों ‘ओ’, ‘उ’ और ‘म’ से मिलकर बना है। इन तीनों को जीवन ऊर्जा, संतुलन और परम चेतना का प्रतीक माना जाता है। जब साधक इसका जप करता है, तो ऐसा विश्वास है कि वह धीरे-धीरे बाहरी संसार की चंचलता से दूर होकर आंतरिक शांति की ओर बढ़ने लगता है।आध्यात्मिक परंपराओं में यह भी माना गया है कि ‘ऊं’ का कंपन शरीर के ऊर्जा केंद्रोंविशेष रूप से नाभि, हृदय और आज्ञा चक्रपर प्रभाव डालता है। कहा जाता है कि इसका नियमित जप साधक की एकाग्रता बढ़ाता है, मानसिक तनाव कम करता है और शरीर व मन के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक होता है। परंतु क्या यह केवल मान्यता है, या ध्यान की गहराई में इसका अनुभव वास्तव में किया जा सकता है?धार्मिक दृष्टि से ‘ऊं’ को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी माना जाता है। यह सृष्टि के निर्माण, पालन और विनाश के शाश्वत चक्र को दर्शाता है। यही कारण है कि इसे केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की कार्यप्रणाली का संकेत माना गया है।उपनिषदों में ‘ओंकार’ को ब्रह्मांड का मूल स्वरूप बताया गया है। कहा जाता है कि यह ध्वनि भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों को अपने भीतर समाहित करती है। अर्थात् ‘ऊं’ केवल एक उच्चारण नहीं, बल्कि समय, चेतना और अस्तित्व की एक गूढ़ अभिव्यक्ति मानी जाती है।सबसे रहस्यमय मान्यता यह है कि ‘ऊं’ का नियमित जप व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। यह मन को शांत करता है, विचारों को स्थिर करता है और साधक को उच्च आध्यात्मिक चेतना से जोड़ने का माध्यम माना जाता है। शायद इसी कारण हजारों वर्षों से साधक इस ध्वनि में उस दिव्य रहस्य को खोजते रहे हैं, जो उन्हें स्वयं से और परम चेतना से जोड़ने की क्षमता रखता है।

ॐ तीन ध्वनियों से मिलकर बना है:

अ — जागृत अवस्था का प्रतीक, जब हम दुनिया को अनुभव करते हैं।

उ — स्वप्न अवस्था का प्रतीक, जब मन अपनी दुनिया रचता है।

म — गहरी नींद का प्रतीक, जब चेतना विश्राम करती है।

लेकिन सबसे रहस्यमयी भाग तब आता है जब “म” के बाद पूर्ण मौन छा जाता है। यही मौन “तुरीय अवस्था” कहलाता है, जिसे आत्मा की परम शांति और ब्रह्म से एकत्व की अवस्था माना गया है।

क्यों माना जाता है इसे दिव्य ध्वनि?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, ॐ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियाँ समाहित हैं। यह सृष्टि के निर्माण, पालन और संहार के चक्र का प्रतीक है।योग और ध्यान में ॐ का जप विशेष महत्व रखता है। कहा जाता है कि इसका कंपन शरीर के ऊर्जा केंद्रों को सक्रिय करता है, मन को शांत करता है और एकाग्रता बढ़ाता है।

ॐ का जाप कैसे करें?

किसी शांत स्थान पर सीधे बैठें।

आंखें बंद करें और गहरी सांस लें।
सांस छोड़ते समय धीरे-धीरे “आ…ऊ…म…” का उच्चारण करें।

ध्वनि के कंपन को छाती, गले और सिर में महसूस करें।

जप समाप्त होने के बाद कुछ क्षण मौन में बैठे रहें।

ॐ जप के लाभ

तनाव और चिंता कम होती है।

मन शांत और स्थिर होता है।

एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है।

भावनात्मक संतुलन बना रहता है।

आध्यात्मिक जागरूकता में वृद्धि होती है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 


 

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