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Lord Ganesha: बुद्धिविनायक और विघ्नहर्ता कैसे बने भगवान गणेश? क्यों मिला प्रथम पूज्य देवता का दर्जा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी
सार

Lord Ganesha: भगवान गणेश, हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य देवता के रूप में विख्यात हैं, जिन्हें 'विघ्नहर्ता' अर्थात् विघ्नों को हरने वाला कहा जाता है। गणेश जी की यह उपाधि उनके अद्भुत स्वरूप, बुद्धि, और शक्ति का प्रतीक है।

गणेश जी
भगवान गणेश, हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य देवता के रूप में विख्यात हैं, जिन्हें 'विघ्नहर्ता' अर्थात् विघ्नों को हरने वाला कहा जाता है। गणेश जी की यह उपाधि उनके अद्भुत स्वरूप, बुद्धि, और शक्ति का प्रतीक है, जो भक्तों के जीवन से सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करती है, लेकिन गणेश जी को 'विघ्नहर्ता' क्यों कहा जाता है? इसके पीछे की पौराणिक कथाओं में इसका जवाब छिपा है। ऐसे में चलिए जानते हैं भगवान गणेश के विघ्नहर्ता बनने की कथा के बारे में...
गणेश

माता पार्वती द्वारा गणेश जी का सृजन

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार माता पार्वती कैलाश पर्वत पर स्नान करने की तैयारी कर रही थीं। उस समय भगवान शिव बाहर गए हुए थे और माता को अपने निजी समय की रक्षा के लिए किसी विश्वसनीय द्वारपाल की आवश्यकता थी। उन्होंने अपने शरीर की मैल से एक सुंदर बालक की मूर्ति गढ़ी और उसमें प्राण फूंक दिए। इस बालक का नाम उन्होंने गणेश रखा, जिसका अर्थ है- 'गणों का ईश' या 'गणों का स्वामी'। माता पार्वती ने गणेश को आदेश दिया कि वे द्वार पर पहरा दें और किसी को भी अंदर प्रवेश न करने दें। गणेश, अपनी माता के प्रति पूर्ण समर्पित, द्वार पर तनकर खड़े हो गए।
गणेश जी

भगवान शिव और गणेश का टकराव

कुछ समय बाद भगवान शिव कैलाश लौटे। द्वार पर एक अनजान बालक को देखकर वे आश्चर्यचकित हुए। शिव ने गणेश से पूछा कि वे कौन हैं और उन्हें अंदर क्यों नहीं जाने दे रहे। गणेश ने विनम्रता से कहा कि माता पार्वती के आदेश पर मैं किसी को अंदर नहीं जाने दे सकता। शिव जी को गणेश की यह बात पसंद नहीं आइ। उन्होंने गणेश को हटने के लिए कहा, लेकिन गणेश अपनी माता की आज्ञा का पालन करने के लिए अडिग रहे। क्रोधित होकर शिव ने गणेश से युद्ध किया। गणेश ने अद्भुत शक्ति का प्रदर्शन किया, लेकिन अंततः शिव के त्रिशूल से उनका सिर धड़ से अलग हो गया।
जब माता पार्वती को इस घटना का पता चला, वे क्रोधित और दुखी हो उठीं। उन्होंने शिव से कहा कि गणेश उनके द्वारा सृजित पुत्र हैं और उन्हें जीवित करना होगा। माता के क्रोध और प्रेम को देखकर शिव ने गणेश को पुनर्जनम देने का निर्णय लिया।
गणेश

गजमुख गणेश का उदय

शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा में जाएं और जो पहला प्राणी मिले, उसका सिर काटकर लाएं। गणों को सबसे पहले एक गज यानी हाथी का बच्चा मिला, जिसका सिर वे काटकर ले आए। शिव ने उस गजमुख को गणेश के धड़ से जोड़ा और अपनी दिव्य शक्ति से उन्हें पुनर्जनम प्रदान किया। इस तरह गणेश गजमुख के रूप में प्रकट हुए।
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विघ्नहर्ता का वरदान

शिव जी ने गणेश को आशीर्वाद दिया कि वे सभी देवताओं में प्रथम पूज्य होंगे और किसी भी कार्य की शुरुआत से पहले उनकी पूजा होगी। साथ ही, उन्हें 'विघ्नहर्ता' और 'विघ्नविनाशक' का वरदान दिया, जिसका अर्थ है कि वे सभी बाधाओं को दूर करेंगे। साथ ही, उन्हें बुद्धि, सिद्धि, और समृद्धि का दाता भी माना गया।

एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं ने गणेश जी की बुद्धि और विवेक की परीक्षा ली तो उन्होंने अपनी सूझबूझ से सभी को प्रभावित किया। एक बार शिव-पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों, कार्तिकेय और गणेश के बीच प्रतियोगिता रखी कि जो पहले पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करके लौटेगा, उसे प्रथम पूज्य का स्थान मिलेगा। कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर तुरंत ब्रह्मांड की परिक्रमा के लिए निकल पड़े, लेकिन गणेश जी ने अपनी बुद्धि से माता-पिता शिव-पार्वती की परिक्रमा की, क्योंकि उनके लिए माता-पिता ही संपूर्ण विश्व थे। उनकी इस बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता का वरदान दिया।

 

विघ्नहर्ता के रूप में गणेश जी की विशेषताएं

गणेश जी को 'बुद्धिविनायक' कहा जाता है। वे भक्तों को बुद्धि और विवेक प्रदान करते हैं, जिससे वे बाधाओं को समझदारी से पार कर सकें। गणेश जी का दयालु स्वरूप भक्तों के दुखों को हरता है और उन्हें संकटों से मुक्ति देता है। गणेश जी का गजमुख और विशाल शरीर उनकी अपार शक्ति का प्रतीक है, जो किसी भी बाधा को नष्ट करने में सक्षम है। गणेश जी की प्रथम पूजा की परंपरा यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी कार्य बिना विघ्न के पूर्ण हो।

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