Ashvattha Vivah : हिंदू धर्म में कई तरह के रीति-रिवाज़ और परंपराएं निभाई जाती हैं। शादी से पहले कुंडली मिलाना बहुत ज़रूरी माना जाता है। माना जाता है कि जब ज्योतिषीय गुण आपस में मिलते हैं, तो वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है।
Ashvattha Vivah : हिंदू धर्म में कई तरह के रीति-रिवाज़ और परंपराएं निभाई जाती हैं। शादी से पहले कुंडली मिलाना बहुत ज़रूरी माना जाता है। माना जाता है कि जब ज्योतिषीय गुण आपस में मिलते हैं तो वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है। इसके उलट अगर कुंडली नहीं मिलती है या कोई खास ज्योतिषीय दोष होता है तो शादी में रुकावटें आ सकती हैं। ज्योतिष में मंगल ग्रह की कुछ खास स्थितियों से 'मांगलिक दोष' बनता है जिसे शादी में एक बड़ी बाधा माना जाता है। अगर किसी पुरुष या महिला की कुंडली में 'मांगलिक दोष' है, तो उन्हें बाद में वैवाहिक जीवन में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही यह भी माना जाता है कि ऐसे व्यक्ति के जीवनसाथी को सेहत से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए शादी से पहले 'मांगलिक दोष' के उपाय करने की सलाह दी जाती है ऐसा ही एक उपाय है 'मांगलिक' व्यक्ति की शादी किसी पेड़ खासकर 'अश्वत्थ' के पेड़ से करवाना। इस परंपरा को 'अश्वत्थ विवाह' कहा जाता है। आइए जानते हैं कि यह रस्म क्यों निभाई जाती है और इससे जुड़े नियम क्या हैं।
'अश्वत्थ विवाह' क्या है?
'अश्वत्थ' का मतलब है पीपल का पेड़। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पीपल के पेड़ को बहुत पवित्र माना जाता है। कुछ परंपराओं में 'मांगलिक दोष' को दूर करने के लिए लड़की की असली शादी से पहले उसकी शादी प्रतीकात्मक रूप से 'अश्वत्थ' के पेड़ से कराई जाती है। इसे असली शादी नहीं बल्कि एक धार्मिक और प्रतीकात्मक रस्म माना जाता है। माना जाता है कि इस रस्म से कुंडली में मौजूद 'मांगलिक' प्रभाव को कम किया जा सकता है। एक और मान्यता यह है कि 'मांगलिक दोष' का असर शादी के बाद जीवनसाथी पर पड़ सकता है इसलिए, पेड़ से शादी करने से ऐसे बुरे प्रभावों को खत्म करने या कम करने में मदद मिलती है।
'मांगलिक दोष' के लिए पेड़ से शादी क्यों की जाती है?
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार मंगल ग्रह ऊर्जा, साहस और अग्नि तत्व का प्रतीक है। कुंडली में मंगल की एक खास स्थिति को 'मांगलिक दोष' का कारण माना जाता है। यह एक पारंपरिक मान्यता है कि 'अश्वत्थ विवाह' जैसी रस्में शादी से जुड़ी रुकावटों और मंगल ग्रह के बुरे प्रभावों को कम करने में मदद करती हैं। धार्मिक परंपराओं में इसे वैवाहिक जीवन की बाधाओं को दूर करने का एक उपाय माना जाता है।
अश्वत्थ विवाह के नियम क्या हैं?
अश्वत्थ विवाह तभी किया जाता है जब होने वाले दूल्हे या दुल्हन की कुंडली में मांगलिक दोष हो। यदि दोनों व्यक्ति मांगलिक हैं तो दोष का प्रभाव खत्म माना जाता है और इस अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती।जब केवल एक साथी मांगलिक होता है, तब अश्वत्थ विवाह किया जाता है आमतौर पर, शुभ समयपर पीपल के पेड़ की पूजा की जाती है।
पीपल के पेड़ को जल चढ़ाने के बाद, रोली, अक्षत, फूल और अन्य पूजा सामग्री अर्पित की जाती है। इसके बाद भगवान विष्णु और अन्य देवताओं का आह्वान करते हुए एक पवित्र संकल्प लिया जाता है। यह अनुष्ठान निर्धारित प्रक्रियाओं का पूरी तरह से पालन करते हुए किया जाता है जिसमें वैदिक मंत्रों का सही उच्चारण भी शामिल है। इस समारोह के दौरान पीपल के पेड़ को नुकसान पहुँचाए बिना पूजा की जानी चाहिए और सभी धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाना चाहिए। यह भी पढ़ें-
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)