Krishnapingala Chaturthi 2025: हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है, जो भगवान गणेश को समर्पित एक पवित्र व्रत है। यह व्रत प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।
Krishnapingala Chaturthi 2025: हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है, जो भगवान गणेश को समर्पित एक पवित्र व्रत है। यह व्रत प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है और आषाढ़ मास में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। यह दिन भगवान गणेश के एकदंत गजानन रूप की पूजा के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। आइए आषाढ़ कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी की तिथि, शुभ योग, पूजा विधि और ग्रह दोष निवारण के उपायों के बारे में जानते हैं।
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी की तिथि और समय
हिंदू पंचांग के अनुसार, कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी 2025 का व्रत 14 जून 2025, शनिवार को मनाया जाएगा।
चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 14 जून 2025, सुबह 02:45 बजे
चतुर्थी तिथि समापन: 15 जून 2025, सुबह 04:10 बजे
चंद्रोदय का समय: रात 09:45 बजे
उदयातिथि के आधार पर, यह व्रत 14 जून को ही रखा जाएगा। इस दिन भक्त सूर्योदय से चंद्रोदय तक उपवास रखते हैं और चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करते हैं।
शुभ योग और नक्षत्र
वैदिक पंचांग के अनुसार, कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के दिन अनेक शुभ योग बन रहे हैं, जो इस व्रत और पूजा को विशेष रूप से प्रभावशाली और पुण्यदायी बनाते हैं।
सिद्ध योग: यह योग प्रातः 07:15 बजे तक रहेगा। सिद्ध योग के दौरान की गई पूजा और मंत्र जाप अत्यंत लाभकारी होते हैं, विशेषकर कार्यों में सफलता प्राप्त करने और बाधाओं को दूर करने के लिए।
साध्य योग: सिद्ध योग के बाद साध्य योग प्रभावी होगा, जो आध्यात्मिक अनुष्ठानों और पूजा के लिए अत्यंत अनुकूल माना जाता है।
मूल नक्षत्र: यह नक्षत्र शाम 04:07 बजे तक रहेगा। मूल नक्षत्र में भगवान गणेश की पूजा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
पाताल भद्रा: इस दिन पाताल भद्रा का प्रभाव रहेगा, इसलिए दिन के समय गणेश पूजा और रात्रि में चंद्र पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है।
इन शुभ योगों के संयोग में भगवान गणेश की आराधना करने से जीवन की सभी कठिनाइयां दूर होती हैं, साथ ही सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
भगवान गणेश की पूजा विधि
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा विधि-विधान से करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र धारण करें।
घर की साफ-सफाई करें और पूजा स्थल पर गंगाजल का छिड़काव करें।
एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की मूर्ति की स्थापना करें।
पूजा सामग्री के लिए गणेश मूर्ति, दीपक, धूप, चंदन, रोली, अक्षत, दूर्वा घास, मोदक, लड्डू, फल, फूल, और पंचामृत लें।
पूजा में तिलकुट और गुड़ का भोग विशेष रूप से शामिल करें।
दीप प्रज्वलन करें और भगवान गणेश को तिलक लगाएं।
गणेश जी को दूर्वा, फूल और फल अर्पित करें। मोदक या मूंग के लड्डू का भोग लगाएं।
'ॐ गं गणपतये नमः', 'ॐ एकदंताय नमः', 'ॐ विघ्नहर्ताय नमः' मंत्रों का 108 बार जाप करें।
गणेश चालीसा और संकट नाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें।
व्रत कथा: कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी की कथा पढ़ें या सुनें।
रात में चंद्रोदय के समय चंद्रमा को कच्चे दूध और जल से अर्घ्य दें। चंद्र मंत्र ॐ सों सोमाय नमः का जाप करें।
इसके बाद गणेश जी की आरती करें और प्रसाद वितरित करें। चंद्र दर्शन और पूजा के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करें।
ग्रह दोष निवारण के लिए विशेष उपाय
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा ग्रह दोषों, विशेष रूप से चंद्र दोष और बुध दोष के निवारण के लिए अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
चंद्र दोष निवारण के लिए चंद्रोदय के समय चंद्रमा को कच्चे दूध में चीनी मिलाकर अर्घ्य दें।
चंद्र मंत्र ॐ सों सोमाय नमः का 108 बार जाप करें।
चांदी का एक छोटा टुकड़ा गणेश जी को अर्पित करें और उसे अपने पास रखें।
बुध दोष निवारण के लिए गणेश जी को दूर्वा की 21 गांठें अर्पित करें। हरे मूंग या हरी दूर्वा का दान करें। ॐ बुं बुधाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें।
सामान्य ग्रह दोष निवारण के लिए गणेश जी को तिल और गुड़ से बने लड्डू अर्पित करें। गरीबों को अन्न और वस्त्र दान करें। पूजा के दौरान संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें, जो सभी प्रकार के दोषों को दूर करता है।
विशेष उपाय
यदि आप किसी विशेष ग्रह दोष से पीड़ित हैं तो गणेश मंदिर में 21 दूर्वा और 11 मोदक अर्पित करें।
गणेश यंत्र की स्थापना करें और उसकी पूजा करें। यह यंत्र नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है।
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी का महत्व
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत उच्च है। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश पृथ्वी पर विराजमान होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन भगवान शिव ने गणेश जी को सभी देवताओं में प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया था।गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा जाता है, जो सभी बाधाओं और कष्टों को दूर करते हैं। यह व्रत संतान की लंबी उम्र और सुखी जीवन के लिए विशेष रूप से किया जाता है।इस दिन पूजा करने से धन-संपदा में वृद्धि होती है। चंद्र और बुध ग्रह के दोषों से मुक्ति मिलती है।